पवन झखोरे से लिपटी हुई
एक सुरमई चाह हूँ मैं
लहराते आँचल में सिमटी हुई
ममता हूँ मैं
रात के काजल में
आँखों का वो एक पाक सपन
तेरी खुशबू से नहाई हुई
चंपा हूँ मैं
आँख से कहती हुई ,
बन बन में भटकती हुई
तेरे दीदार की हर पल में बसी
खुशनुमा ख़्वाहिश हूँ मैं !!
अनुपमा त्रिपाठी
''सुकृति "
