अब क्यों उड़ता है एकाकी ,
मन-भाई उन्मुक्त उड़ान,
देखकर स्वर्णिम विहान ,
विस्तृत नभ मैं लूँ पहचान ......!!
पंख पसारे उड़ता जाता ,
सीमाहीन क्षितिज तक जाता ,
ऊपर से जग छोटा दिखता,
खूब हवा से बातें करता ,
नापता है आसमान...!!
विजय गान करता रसपान,
गैरों की दुनियां में रहता ,
जग दर्शन का मेला है ,
तो फिर क्यूँ आज अकेला है ...?
वसुधा पर है आशियाना ,
देख विहंगम दृश्य धरा का ,
देख विहंगम दृश्य धरा का ,
नीड़ से दूर चले मत जाना ...!!
क्यूँ खोया है सपनो में.......?
पंछी वो तो है देस बेगाना ,
है तुझको वापस ही आना ,
नैन बिछाए राह तके है
छोटी सी पाखरिया ....!!!!!









