दीपक जला -
नीलाम्बर पधारा है,
धरा द्वार ...!!
सुरमई सांझ
ढल रही है ...!!
ढल रही है ...!!
सुरों की सुरभि
बिखेर रही है ..!!
बिखेर रही है ..!!
पट खुले हैं रागों के-
नीलाम्बर
सोच में डूबा है ...
कोमल रिषभ,शुद्ध गंधार
और तीव्र मध्यम
को साथ ले-
कोमल रिषभ,शुद्ध गंधार
और तीव्र मध्यम
को साथ ले-
आज पूरिया या मारवा
किस मंदिर जाऊं ...?
किस मंदिर जाऊं ...?
पूरिया धनाश्री भी
आरती कर रही होगी ...!!
किससे प्रसाद पाऊँ ....?
दूर से ही सुनाई देती है...!!
अनायास मन रिझा लेती है ....!!
अनायास मन रिझा लेती है ....!!
मंदिर के घंटों की -
गूंजते हुए शंखों की-
हृद झंकृत करती हुई...
हृद झंकृत करती हुई...
मोहक-
चित्ताकर्षक -
गुरुत्वाकर्शक...नाद ...!!
चित्ताकर्षक -
गुरुत्वाकर्शक...नाद ...!!
और सामवेद के
सम्मिलित स्वर ...!!
जैसे भाव हों प्रखर ..!!
ये प्राचीन मंदिर,
इन रागों के-
पुष्कल निवास ..!
सुसज्जित हैं-
मन वीणा के तारों से ...!
अलंकृत हैं -
राग -सुर अलंकारों से ..!
प्रकांड पंडित यहाँ,
प्रवीण हैं -
मन्त्र -उच्चारण में ...!!
दिव्य शांति प्रसारण में ....!!
अखंड विश्वास हमारा..........
सुरीला इतिहास हमारा ...
कहाँ ..कब .....
कैसे खो गया ...?
सोचते सोचते क्लांत ...!
मन मेघन बरस गया ...!!
संधिप्रकाश राग :सुबह और शाम जब तम और प्रकाश की संधि होती है ,उस समय कुछ विशिष्ट रगों को गाया जाता है ,जिन्हें संधिप्रकाश राग कहते हैं |कोमल रिषभ (रे ),शुद्ध गंधार (ग )और तीव्र मध्यम (म )का प्रयोग इन रागों की विशेषता है |
भैरव सुबह का संधिप्रकाश राग है और मारवा शाम का |परम अचरज की बात ये है ...जब आप राग भैरव सुनते हैं समझ में आता है ...उज्जवल प्रकाश आने वाला है ...और जब मारवा सुनते हैं ...लगता है ...अंधकार छाने वाला है ...!!मन न माने तो सुन कर देख लीजियेगा ........!!
अब तक आप समझ गए होंगे ....पूरिया ,मरवा ,पूरिया धनाश्री -सांझ के संधिप्रकाश रागों के नाम हैं ..!!
सामवेद गाया जाता है ...जो ये बताता है की हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का इतिहास कितना पुराना है ...!!या यूँ कहिये ...मानव और स्वर का रिश्ता कितना पुराना है ...!!

