नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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04 February, 2013

शारदे माँ श्वेत वसने वंदना स्वीकार कर ....

शरदे माँ श्वेत वसने वंदना स्वीकार कर ....
हो रहे पद्भ्रांत सारे ...विश्व का उद्धार कर .....

इस बसंत में विश्व शांति के लिए की है प्रार्थना ....
आज आप को भी सुनाने का मन हुआ .....
बल्कि आइये मेरे साथ हम सब मिल कर माँ शरदे से यह प्रार्थना करें .....


इसे ईयर फोन पर सुनिएगा तब शब्द सही समझ मे आएंगे ....

20 July, 2012

श्याम भजन ....

वैसे तो गीत को स्वर देना एक अलग ही विधा है ..!कभी इससे  पहले कोशिश नहीं की थी किसी गीत को स्वर देना की ...पर आज समझ मे आया प्रोत्साहन क्या होता हैऔर क्या कुछ कर सकता है .. ...!मुझे कभी विश्वास नहीं था मैं कर पाउँगी पर आप सभी के कहने पर ही आज मैंने  अपने  लिखे एक श्याम भजन ..रीत रही मोरी प्रीत .....को स्वर्बद्ध किया और स्वयम ही इसे संगीत्बद्ध   भी किया  है ...!!इसका छायांकन  भी मेरी ही कोशिश है  ...मेरे जीवन की एक श्रेष्मठतम  उपलब्द्धी है ये ...!और श्रेय जाता है ...आप सभी को ....
मधुरेश ,सलिल जी ,मनोज जी,अशीष जी ,प्रवीण जी ,यशवंत ,मुकेश ,अरविंद जी ,संगीता दी अनमिका जी ,अनु,दिगम्बर नासवा जी,रमाकांत जी ,शिखा जी,रश्मी दी ,अमृता जी,बाबुषा ,धीरेंद्र जी ,सतीश जी, शास्त्री जी,रविकर जी ,ललित जी ,शिवम ,अभि,वीरुभई जी ,संजय भास्कर जी ,हिमांशु जी ,...
समय समय पर आप सभी मुझे बहुत प्रोत्साहित करते रहे हैं कि मैं अपनी  रचना स्वयम स्वर बद्ध  करूं.....वैसे तो और भी बहुत नाम हैं लिखती जाउँ तो उसी से पोस्ट भर जायेगी ......

आप सभी का स्नेह और आशिर्वाद भरपूर  मिला है ....तभी  ये प्रभु कृपा भी हुई है ...लीजीये ये विरह गीत सुनिये .....



29 March, 2012

रे मन ... पथिक ...रसिक ....अलबेला ....!!


रे मन  पथिक ..रसिक ..अलबेला ....
झूम-झूम चलता ......
 ..रस लेता ...
मकरंद मंद-मंद मुस्काता ...
बुनता जाता  ताना-बना ...
अद्वैत ..
तीन  लोक  ..पञ्च तत्व  ...सप्त सुर ...नवल  रस ...!!
गुन गुन रमता जाता है मस्ताना ...
जग से अनजाना  ...

छन-छन ,राग ,अनुराग...
स्वर ...अलंकार .....!!
बढ़ता चल ...करता चल ...
अलंकृत ....विभूषित.....मन को ..
राग से ,अनुराग से ..असंख्य प्रकार ...!!



सृष्टि के सौरभ से ...स्वयं को ....
मन रंग ,रंग ,रंग ले .





सँवर जा  भाँति-भाँति ले ....
 भर-भर ले ,झर-झर दे ....
...धन-धन भाग सुहाग ...
...रस रंग सुभग सुभाग ......!!

10 February, 2012

ये जीवन ...तुम्ही से मिला ....!!

पुनः उर्जा संचारित हुई ...
पूर्व से उदय हुआ प्रकाश ...
मिथ्या से दूर ...
शाश्वत सत्य के पास ...
कर  रही  थी राग का अभ्यास ..
राग पूर्वी ....सुनते  हुए.. हुआ आभास ...
सूरज  का पूर्व  से ..
मन का पूर्वी से  ..
कैसा अनादी ..अनंत ..अपूर्व रिश्ता है ...!!
जैसे पहली बार सुनकर भी ..
कोई राग सुनी हुई क्यों लगती है ...?

पहली बार देख कर भी ..
कोई जाना पहचाना क्यों लगता  है ...?
पहली बार मिलकर भी ..
कोई चिर परिचित क्यों  लगता है ...?
पहली बार पढ़ कर भी ..
कुछ  शब्द मन में बसे हुए ...
रचे  हुए क्यों लगते हैं ....?????

जीवन की यात्रा ...
जो सदियों से चल रही है ...!!

कुछ नया नहीं है ...
आती-जाती  सांस  है बस ...
पल का साथ है बस ...
कुछ आंसू ...जो जिंदगी हमें  देती है ...
फिर भी  ... हम दे सकें  जिंदगी को ...
एक  मुस्कान है बस ..!!


कहाँ से आते हैं ये भाव ......
जो कभी जिए ही नहीं ...?
कहाँ से आते हैं वो शब्द ...
जो कभी गढ़े ही नहीं .......?

ओह विस्मित हूँ ...जब देखती हूँ ....
मेरा अपना कुछ भी नहीं ....
करती रही हूँ .. सतत प्रयास ...
फिर भी ...
मेरे बस में कुछ भी नहीं ...
न देना ..न पाना ...
न प्रेम ...न बैर ...
न सुख ..न दुःख ..
न समर्पण ..न अहंकार ...
न स्मृति ..न विस्मृति ..
न क्रिया ....न प्रतिक्रिया ...
बस संचयन  ही कर पायी हूँ अपने भीतर ...
अब तक ...तुम्हारा ही दिया ...!!
ये रंग ये रूप ..
ये छाँव ये धूप
रक्षक भी तुम ही हो प्रभु .....!!
ये मन ..ये जीवन ...तुम्ही से मिला ....!!

*पूर्वी-राग का नाम है 

10 July, 2011

स्वरोज सुर मंदिर (3)


मैं सरोज तुम अम्बुज मेरे ...
सरू से दूर कमल मुरझाये ...
ईमन यमन राग बिसराए ..
यमन राग मेरी  तुमसे है ........
निश्चय ही ........!!!!
मध्यम तीवर सुर लगाऊँ .........
जब लीन मगन मन सुर  साधूँ ....
तुममे खो जाऊं ...
आरोहन -अवरोहन सम्पूरण ......!!
अब रात्री का प्रथम प्रहर..

हरी भजन में ध्यान लगाऊँ .....!!

इसी प्रार्थना से स्वरोज सुर  मंदिर की तीसरी कड़ी प्रस्तुत है ..!!

नाद ब्रम्ह.....परब्रम्ह ...!!
प्रभु तक पहुँचाने का एक मार्ग  संगीत भी है  नाद के विषय में कुछ रोचक जानकारी से आज की चर्चा प्रारंभ करते हैं |आज नाद के गुण और उसके प्रकार के विषय में चर्चा करते हैं 
नाद के दो प्रकार होते हैं :
  1. आहत नाद 
  2.  अनाहत नाद .
ये दोनों ही पिंड (देह)से प्रकट होते हैं ,इसलिए पिंड का वर्णन किया जाता है |

आहत नाद :जो कानो को सुनाई देता है और जो दो वस्तुओं के रगड़ या संघर्ष से पैदा होता है उसे आहत नाद कहते हैं |इस नाद का संगीत से विशेष सम्बन्ध है |यद्यपि अनाहत नाद को मुक्तिदाता मन गया है किन्तु आहात नाद को भी भाव सागर से पार लगानेवाला बताया गया है |इसी नाद के द्वारा सूर,मीरा इत्यादि ने प्रभु-सानिध्य प्राप्त किया था और फिर अनाहत की उपासना से मुक्ति प्राप्त की ...!

अनाहत नाद ::जो नाद केवल अनुभव से जाना जाता है और जिसके उत्पन्न होने का कोई खास कारन न हो ,यानि जो बिना संघर्ष के स्वयंभू रूप से उत्पन्न होता है ,उसे अनाहत नाद कहते हैं ;जैसे दोनों कान जोर से बंद अनुभव करके देखा जाये ,तो 'साँय-साँय ' की आवाज़ सुनाई देती है
इसके बाद नादोपसना की विधि से गहरे ध्यान की अवस्था में पहुँचने पर सूक्ष्म नाद सुनाई पड़ने लगता है जो मेघ गर्जन या वंशिस्वर आदि से सदृश होता है |इसी अनाहत नाद की उपासना हमारे प्राचीन ऋषि -मुनि करते थे |यह नाद मुक्ति दायक तो है ...किन्तु रक्तिदायक नहीं |इसलिए ये संगीतोपयोगी भी नहीं है ,अर्थात संगीत से अनाहत नाद का कोई सम्बन्ध नहीं है |
  
    वास्तव में ध्वनि  का वर्गीकरण वैज्ञानिक ढंग से तीन गुणों के अधर पर किया जा सकता है :
  1. तारता अर्थात नाद का ऊँचा -नीचपन (Pitch.)
  2.  तीव्रता या प्रबलता अथवा नाद का छोटा बड़ापन (Loudness)
  3.   गुण या प्रकार (Timbre)  
चलिए  अब  लौट  चलते  हैं  राग  यमन  पर  |आपको आज राग यमन की विस्तृत जानकारी देती हूँ|
                                   राग यमन
 ठाट :कल्याण             जाती :सम्पूर्ण           समय :रात्री का प्रथम प्रहार 
वादी :ग(गंधार)           संवादी:नि (निषाद)


आरोह:   नि रे ग प धनि सां
अवरोह:  सां नि ध प ग रे सा
    मध्यकालीन ग्रंथों में यमन का उल्लेख मिलाता है |परन्तु प्राचीन ग्रंथों में केवल कल्याण राग दिखाई देता है यमन नहीं |आधुनिक ग्रंथों में यमन एक सम्पूर्ण जाती का राग माना गया है |
    राग का अध्ययन करते करते ही अब आपको राग वर्णन में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न सब्दों की जानकारी देती हूँ सबसे पहले देखें ठाट क्या है ...?
    ठाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे राग उत्पन्न हो सके | पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम काल में 'राग तरंगिणी ' के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परंपरागत 'ग्राम और मूर्छना -प्रणाली' का परिमार्जन करके मेल अथवा ठाट को सामने रखा |उस समय तक लोचन कवि के अनुसार सोलह हज़ार राग थे ,जिन्हें गोपियाँ कृष्ण के सामने गया करती थीं;किन्तु उनमे से छत्तीस राग प्रसिद्द थे |सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अंतर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचार में आ गया,जो उस समय के प्रसिद्द ग्रन्थ 'संगीत -पारिजात'और 'राग विबोध'में स्पष्ट है |इस प्रकार लोचन कवी से आरंभ होकर यह ठाट पद्धति चक्कर काटती हुई श्री भातखंडे जी के समय में आकर वैधानिक रूप से स्थिर हो गई |
    रागों का अध्ययन करने के हिसाब से सात स्वरों के प्रयोग के आधार पर ठाट का निर्माण किया गया |इस प्रकार हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अनुसार अब हम भातखंडे जी द्वारा बताये गए दस ठाट मानते हैं |जो इस प्रकार हैं:
    बिलावल ठाट :               सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (सभी स्वर शुद्ध प्रयोग)
    यमन या कल्याण ठाट : सा रे  ग  म  प  ध  नी  सां   |  (म तीव्र )
    खमाज ठाट :                 सा  रे  ग  म  प  ध  नी सां  |  (नी कोमल)
    भैरव ठाट :                    सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  ध  कोमल )
    पूर्वी ठाट :                      सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  ध  कोमल  म तीव्र  )
    मारवा  ठाट :                  सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  कोमल  म  तीव्र  )
    काफी ठाट :                    सा  रे    म  प  ध  नी  सां  |  (ग  नी  कोमल)
    असावरी ठाट :                सा रे  म  प   नी  सां   |  (ग  ध  नी  कोमल  )
    भैरवीं ठाट :                     सा  रे म  प   नी  सां  |   (रे ग ध नी कोमल )
    तोड़ी ठाट :                      सा  रे      प    नी  सां  |  (रे  ग  ध  नी  कोमल  म  तीव्र )

    अब आप ये बात समझ सकेंगे कि राग यमन कल्याण ठाट का राग है क्योंकि उसमे म  तीव्र प्रयोग होता है |
    आज के लिए इतना बहुत है ... कोई बात समझ न आई हो तो कृपया निसंकोच पूछ लें ...फिर शीघ्र  मिलेंगे ...
    क्रमशः ........

      08 June, 2011

      सुरमई सांझ ढल रही है ...!!

      अनादि  काल .....
      अनादि  काल .....
      सदियों ..पीछे -
      जा पहुंचा है मन .....
      संधिप्रकाश का
      दीपक जला -
      नीलाम्बर पधारा है, 
      धरा द्वार ...!!
      सुरमई सांझ 
      ढल रही है ...!!
      सुरों की सुरभि 
      बिखेर रही है ..!!
      पट खुले हैं रागों के-
      नीलाम्बर    
      सोच में डूबा है ... 
      कोमल रिषभ,शुद्ध गंधार 
      और तीव्र मध्यम 
      को साथ ले- 
      आज पूरिया  या मारवा 
      किस मंदिर  जाऊं ...? 
      पूरिया   धनाश्री भी
      आरती  कर  रही होगी ...!!
      किससे प्रसाद पाऊँ ....?
      दूर से ही सुनाई देती है...!!
      अनायास मन रिझा लेती है  ....!!
      मंदिर के घंटों  की -
      गूंजते हुए शंखों की-
      हृद  झंकृत करती हुई... 
      मोहक-
      चित्ताकर्षक - 
      गुरुत्वाकर्शक...नाद ...!!
      और सामवेद के 
      सम्मिलित स्वर ...!!
      जैसे भाव हों  प्रखर ..!!
      ये प्राचीन मंदिर,
      इन रागों के- 
      पुष्कल निवास ..!
      सुसज्जित हैं-
      मन वीणा  के तारों से ...!
      अलंकृत हैं -
      राग -सुर अलंकारों से ..!
      प्रकांड पंडित यहाँ,
      प्रवीण हैं -
      मन्त्र -उच्चारण में ...!!
      दिव्य शांति प्रसारण में ....!!
      सुरों  के  आलोक  से  प्रकाशित  वातावरण ....
      ये सौभाग्य हमारा ...
      अखंड  विश्वास हमारा..........
      सुरीला इतिहास हमारा ...
      कहाँ ..कब .....
      कैसे खो गया ...?
      सोचते सोचते क्लांत ...!
      मन मेघन बरस गया ...!!


      संधिप्रकाश राग :सुबह और शाम जब तम और प्रकाश की संधि होती है ,उस समय कुछ विशिष्ट रगों को गाया जाता है ,जिन्हें संधिप्रकाश राग कहते हैं |कोमल रिषभ (रे ),शुद्ध गंधार (ग )और तीव्र मध्यम (म )का प्रयोग इन रागों की विशेषता है |
      भैरव सुबह का संधिप्रकाश राग है और मारवा शाम का |परम अचरज की बात ये है ...जब आप राग भैरव सुनते हैं समझ में आता है ...उज्जवल प्रकाश आने वाला है ...और जब मारवा सुनते हैं ...लगता है ...अंधकार  छाने वाला है ...!!मन न माने तो सुन कर देख लीजियेगा ........!!
      अब तक आप समझ गए होंगे ....पूरिया ,मरवा ,पूरिया धनाश्री -सांझ के संधिप्रकाश रागों के नाम हैं ..!!
      सामवेद गाया जाता है ...जो ये बताता है की हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का इतिहास कितना पुराना है ...!!या यूँ कहिये ...मानव और स्वर का रिश्ता कितना पुराना है ...!!