नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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29 March, 2012

रे मन ... पथिक ...रसिक ....अलबेला ....!!


रे मन  पथिक ..रसिक ..अलबेला ....
झूम-झूम चलता ......
 ..रस लेता ...
मकरंद मंद-मंद मुस्काता ...
बुनता जाता  ताना-बना ...
अद्वैत ..
तीन  लोक  ..पञ्च तत्व  ...सप्त सुर ...नवल  रस ...!!
गुन गुन रमता जाता है मस्ताना ...
जग से अनजाना  ...

छन-छन ,राग ,अनुराग...
स्वर ...अलंकार .....!!
बढ़ता चल ...करता चल ...
अलंकृत ....विभूषित.....मन को ..
राग से ,अनुराग से ..असंख्य प्रकार ...!!



सृष्टि के सौरभ से ...स्वयं को ....
मन रंग ,रंग ,रंग ले .





सँवर जा  भाँति-भाँति ले ....
 भर-भर ले ,झर-झर दे ....
...धन-धन भाग सुहाग ...
...रस रंग सुभग सुभाग ......!!

24 December, 2011

दीप प्रज्ज्वलन ....!


एक गणेश स्तुति 
व दीप प्रज्ज्वलन का गीत आपको सुना रही हूँ .आशा है आप पसंद करेंगे ....!!

Merry chritmas....!!



दीपो ज्योति परब्रम्ह ,
दीपो ज्योति जनार्दना ,
दीपो हरतु में पाप,
संध्या दीपो नमस्तुते ...

शुभम करोतु कल्याणं ,
आरोग्यं सुख  सम्पदाम ,
मम बुद्धि प्रकाशस्च
दीपो ज्योति नमोस्तुते ... ....!!


01 December, 2011

तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

 मैं ...अभी तो ..
 लेने का हिस्सा  हूँ ..
लेती ही रहती हूँ..
जग  से ...!!

जग  में रहकर ...
जग  से हटकर ...
जग  को  देकर ...
कुछ देने का किस्सा बनूँ....
तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

अरुण की स्वर्णिम आभा  सी
 निखर  सकूं ..
गुलमोहर  के मोहक  रंगों  सी ..
निखर  सकूँ ..

कल-कल , सरिता के शीतल  जल सी..
 बिखर  सकूँ...
मदमाती, मस्त पवन के  झोंखे सी ..
बिखर सकूं ..

रेगिस्तान में फैली हुई स्वच्छ  रेत सी
बिखर सकूँ ..
नम आँखों में बसते ख्वाबों सी ..
बिखर सकूँ..

सप्त सुरों के सरगम सी ..
निखर सकूँ ...बिखर सकूँ ...
कुमुदिनी की पंखुड़ी सी ..
निखर सकूँ..बिखर सकूँ..


निखर सकूँ ..बिखर सकूँ ..इस तरह तो ......?

 .....तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

I know not much.....in fact nothing...............!
O GOD...!!Hold me and behold me as I tread ..THE PATH ...IN PURSUIT OF EXCELLENCE ...towards ...
YOU....THE OMNIPRESENT.....!!!!!!

06 September, 2011

खिल -खिल जाये ..सकल भुवन अपार .....!!

खिल-खिल    जाये ..सकल भुवन अपार .....!!


    इन रंगों को देख कर जब कुछ लिखना चाहा....गहन सोच में डूब  गया मन .....बरबस यही सोचने लगी..इन  रंगों  का  उद्गम  क्या  है  ...?इतने  खूबसूरत  रंग  आये  कहाँ  से  हैं  ...?
  स्वयं से प्रश्न तो स्वयं से ही उत्तर ..
.....अपनी  माँ ..धरा ..जो हमें धारण करती है ...हमारा पालन करती.....ये रंग उसी के तो हैं ...तब 
कुछ इस तरह बह निकले मेरे शब्द...

.





  painting by Pragya Singh.

रंग रेज हो...तुम प्रभु ...
सकल भुवन के ...
साहिब मेरे ....!!
कृपा दृष्टि अबके ऐसी दो...
जीवन में बस ऐसे रंग हों....!
हर्ष हो गीत हो नहीं बैर हो...!!
बहती धारा रंगों के संग ..
भीगा-भीगा हो..निखरा हो..
 सप्त  सुरों का गहरा ये रंग... 
और बिखरा हो खिलाता सा  ..
 सृजित ..जीवित ..प्रस्फुटित .. 
प्रत्येक सृजन ..!!



रंगरेज हो ..तुम प्रभु ..
सकल भुवन के...
साहिब मेरे...
ऐसे कुशल चितेरे ....!!

कीजे  किरपा ..
निजजन पर ..
नीलगगन से नील श्याम रंग ...
 नीलकंठ की जटा  से  ये  गंग .. 
नील धरा की पावस धारा...!!
 धन-धन गाए मन मतवारा ..!!
सिंचित....मेरा-सबका ये मन...
अमृत बरसे घर- घर-आँगन...!

पीत सी प्रीत चटख   खिले  ऐसी ..
 हो जाए ..नव-पल्लवी  सा. ....
निश्छल  कोमल....
खिला-.खिला ..हरित मन..!!

मन में शुभ रंगों की...
ऐसी हो बहार...
बरसे रस   फुहार ...
पृथ्वी  सा  रूप  सँवार...
खिल- खिल  जाये ..सकल भुवन अपार .....!!






संगीत के विषय में जानना चाहें  तो पधारें यहाँ ...मेरा नया ब्लॉग ...
http://swarojsurmandir.blogspot.com/(स्वरोज सुर  मंदिर )

05 July, 2011

स्वप्निल जीवन ......!!

मेरे मीत ....!!
निर्मल मन के-
भावों सी हो.......
अपनी उज्जवल  प्रीत .....
ज्यों थाट बिलावल  सा .....
शुद्ध स्वरों सा-
 मेरा संगीत .....

शुद्ध अनिल सा ..
मलयानिल सा ..
चाहूँ जीवन .... 
नित साधे है तन .....
आतुर ये मन ....
आओ चलें 
उस ओर जहाँ ......
मंद पवन 
अमंद विचार हों ....
स्वप्निल बयार 
की ही बहार हो .....!!
बरसों के
उज्जवल प्रयास से ..
तुम से मुझ से अपने तप से .....
अपने मन मंदिर में ....
मेरे घर आँगन में ....
वृंदा का वन
बन वृन्दावन ..
मन सावन बन ..
बदरा  प्रेम बौछार  ही बरसे ...
तृषा से मन कभी न तरसे ....
आओ चलें उस ओर जहाँ...
श्याम की गैया ...
सोन चिरैया सा ....
स्वप्निल जीवन हो .......!!!!!!!!!!!!