सँजो रही हूँ ....
जीवन का एक एक पल
और ...बूंद बूंद सहेज ....
भर रही हूँ मन गागर ...
टिपिर टिपिर मन पर पड़ती ....
तिमिर हटाती बूंद बूंद ........
जैसे झर रही है वर्षा ...
उड़ेलने को है व्याकुल.......
अपना समग्र प्रेम सृष्टि पर ...
गुन रही हूँ भाव ...
कुछ भर रही हूँ रंग ....
कुछ बुन रही हूँ ख़ाब ....
कभी घिर जाती हूँ ..
मदमाती सावन की श्यामल घटाओं से ....
कभी भीग जाती हूँ ......
तर बतर अतर .....
वर्षा की बौछारों से .....
झूमती डार डार ....
कभी मंद मंद मलयानल ....
जैसे लहरा देता है .....
सृष्टि का आँचल .....मन में हर दृश्य नया रंग भर जाता ...
सावन ....मनभावन ...सा
मयुर पंखी मन कर जाता .....



