नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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19 September, 2013

ज़िंदगी मुस्कुराने लगी ...!!

रात  ढली   और ....
सुबह कुछ इस तरह  होने लगी ....!!

गुलमोहर  से रंग झरे ...……
सूरज ऐसा रोशन हुआ ...
कि मोम भी पिघलने लगी ...

आम्र की मंजरी पर बैठी कोयल ...
पिया का पतियाँ  लाई .....
कूक कूक
राग वृन्दावनी  सारंग सुनाने लगी ...

भरी दोपहर याद पिया की ..
बिजनैया जो डुराने लगी ...
कूजती रही  कोयल ...
हूक जिया की,
पल पल जाने लगी ...
निरभ्र  आसमान में ,
चहकते विहग ....
जैसे ज़िंदगी मुस्कुराने लगी ...!!

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वृन्दावनी सारंग दिन में गाए जाने वाला राग है …!!
बिजनैया -पंखा
डुराए -झुलाना .

26 June, 2012

बूंद बूंद स्वाति बरस... .. क्षुधा मिटाऊँ....मैं तर जाऊँ ...!!

Pied cuckoo...



चातक की प्यास लिये ...
साध ..रे मन साध ....साध ...!!
स्वाति की आस लिये ...
ताक रहा है आसमान ...!!

रे मन ..कोमल रिशब (रे)...साध रहा ...
देख देख घनघोर  घटा ....
पावन मधु रस  तरस रहा ...


आरत  सी भावना  लिये ...
अनुराग की साधना लिये  .....
स्वाति...स्वाति ....अब बरसो ...भी ..
श्रुति दीप  अर्चन लिये ...
कुछ बह सा  रहा है मन ...
हृदय के तार झंकृत कर ..
अनहद नाद सा ...
चातक की प्यास लिये ...
स्वाति की आस लिये ...
ताक रहा है आसमान ...



कुछ कह सा रहा है मन ....!!

अब करता  मनुहार ...
री बूंद बरस जा मोरे  मन द्वार ..
गंगा ना जानुँ  ...जमुना ना जानुँ ...
नित घट-घट  बिचरन नाहिं जानुँ ...
रे निर्मल जल .....
प्रेम रस ....
बूंद बूंद स्वाति बरस.....
हृद सील  तोष  पाउँ ...
क्षुधा मिटाऊँ....मैं तर जाऊँ ...!!
मैं तर जाऊँ ...!!

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प्रभु लीला का एक अद्भुत उदाहरण .....

चातक का स्वर रिशब(रे) होता है ऐसा संगीत शास्त्रों मे कहा गया है |और चतक सिर्फ वर्षा का जल पी कर ही अपनी प्यास बुझाता है अन्य पानी पीता  ही नहीं |पूरे साल वर्षा की बाट जोहता है ....!!स्वाति नक्षत्र मे जब वर्षा पड़ती है ....चोंच  खोल वही पानी पीता है ........बस मनो अमृत ही गृहण करता  है ....

27 December, 2011

नैहरवा हमका न भावे ....!!

कबीर पढ़ना और गाना अपने आप में एक आलौकिक आनंद देता है .....!!उनके भाव गाते वक़्त मैं इस दुनिया में होते हुए भी नहीं होती .....!!


जब ज्योति जलती है ... हमारे बीच  ...प्रेम की ...ज्ञान की ...भक्ति की ...हमारे अंदर ....
जब हम वेद-पुराण की बात करते हैं ....अपनी सभ्यता संस्कृति की बात करते हैं ...अपनी भावनाओं की बात करते हैं ...तो सहज ही ध्यान आता है कबीरदास जी का ...उनके दोहों को पढ़ना और सुनना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव है ...!
पहले हम जीवन में भोग और विलास के  पीछे भागते हैं एक अंधी दौड़ में ..जो हमें चाहिए उसके पीछे ....जब वो सब हमें मिल जाता है ...तब एक अजीब से खालीपन का एहसास होता है ...और याद आते हैं वो प्रभु जिन्हें हम अपने व्यस्त जीवन में....भूले- बिसराए बैठे हैं ...प्रभु से एकाकार होने का मन करता है ....और लगता है ...

साईं की नगरी परम अति सुंदर ...
जहाँ कोई जावे  न आवे ...

उस नगरी तक ....उस प्रभु तक मैं अपना संदेस ...कैसे पहुँचाऊँ ...?

बिन सतगुरु आपनो नहीं कोई .....कहत कबीर सुनो भाई साधो ....सपने में प्रीतम आवे ...
जी हाँ अगर गुरु कृपा हो तो रास्ता आसान हो जाता है ....
कबीरदास जी कहते हैं ....

नैहरवा हमका न भावे ....

साईं की नगरी परम अति सुंदर ...अति सुंदर ...
जहाँ कोई जाए न आवै ..
चाँद सूरज जहाँ पवन न पानी ...
को संदेस पहुँचावे ...
दरद यह साईं को सुनावे ...
नैहरवा ....

बिन सतगुरु आपनो नहीं कोई ...
आपनो नहीं कोई ...
जो यह राह बतावे ...
कहत कबीरा सुनो भाई साधो ..
सपने में प्रीतम आवै ...
तपन यह जिया की बुझावे ...
नैहरवा .... 



इस गीत पर अन्य कलाकारों का सहयोग इस प्रकार है ...

हारमोनियम पर -नयन व्यास जी
सिंथ पर हैं -डॉ.मुकुल आचार्य जी
तबले पर -हामित वालिया जी
होस्ट हैं -डॉ पूनम कक्कड़  जी.


12 June, 2011

तलाश ....!!

दंभ अकारण घेरे था .....
श्रद्धा से दूर हुई  मैं ..
ढूँढ रही थी 
तुम में खुद को ...
भटक रही थी 
निर्जन वन में .... 
मिला न मुझको वो सुर मेरा ...!!
ढूँढ -ढूँढ जब 
क्षीण हुआ मन ..
जीर्ण हुआ तन ..

त्याग दिया 
बाल-हठ अपना......
अब मैं ..
खुद में  ढूँढ रही हूँ ...!!
फिर भी  तुमको ढूँढ रही हूँ ...!! 
प्रभु ..मैं तुमको ढूँढ रही हूँ ...!!!!!

01 June, 2011

बड़ी ही कठिन है डगर पनघट की ....!!

बड़ी ही कठिन है डगर पनघट की ....
अब" स्वप्न पनघट" पर खड़ी-खड़ी ..
करबद्ध ...
है प्रेम जल गागरी
जमुना -जल  भरी
सर पर ...
दिन गए बीते बहुत ...
प्रभु तुमरी छाप अद्भुत ...!!
आज सहसा ठिठक ...
मनः पटल
 टटोल रही हूँ ...
प्रभु तुम हो मन में ..
तभी तो ..
अंतर्मन से
पूँछ रही हूँ ...
बताओ  तो ...
कावेरी ..नर्मदा ...गंगा ...या 
जमुना-जल   क्या है ...?
आपनी ही ..
कभी कल-कल करती  थीं किलोल......
ऐसी स्वच्छ  नदियों की ..
अपने ही द्वारा
दूषित .. प्रदूषित ..
की गयी दुर्दशा देख..
आकुल- व्याकुल  है मन ...!!


चिर परिचित
स्मित मुस्कान..
अधरों पर  धरे .... ..
धरा पर हरियाली सी ..
छटा बिखेरते अपनी..
हरित जाज्वल्यमान  करते उसे ...
दिखाते हो अपना रूप ..
 नित्य ही  तुम  सबको ....
फिर  मुझे  बुलाते हो ....
दू ....र..कहीं ...!!
और  दुगुने उत्साह से ...
तीव्र आवेग से ...
चलने लगती हूँ मैं ...
तुम्हारे निशान ढूंढते हुए ...
तेज़  कदमताल  करते  हुए  ..
नदी की धारा सी ...!!!!


चलते चलते
छलकती जाती है
गागरी ..
प्लावित ...सिंचित ...
भीगता जाता है मन ...
देते  हो  शब्द   मुझे 
और  कहते  हो मुझसे .. ..

ये प्रेम जल  ही तो ....
स्मरण है मेरा  ...
घूंघट है तुम्हारा .....
आवरण है मन का ..
आचरण है तन का ...
आंकलन जीवन का ...

गति है ..
सद्गति है ..
दुर्गति कदापि नहीं ...
स्त्रोत है ..
बहाव है  फैलाव है ..
रुकाव ..अड़चन ...कभी भी नहीं ...!!

क्षुधा मिटाता ये जल ..
झांको इसमें तो ..
पाओ ....
अपना  ही  प्रतिबिम्ब ..... .
स्वरुप है ..
सरूप  है ..सुरूप है ..
जहाँ देखो वहां ...
यहाँ प्रेम ही प्रेम है ...!
आनंद   ही आनंद है ...!!
संजो सको तो ..
संजो लो इसे ....
और  .....
मेरे पीछे आते हो तो सोच लो ...
बड़ी ही कठिन है ये  डगर पनघट की ....!!
टूट जाता है भ्रम मेरा ...
जाग जाती हूँ ...
चौंक कर स्वप्न से .....
और सोचती हूँ ...
सच में ...
वह दिव्य स्वप्न झूठ  कहाँ था ...?
बड़ी ही कठिन है डगर पनघट की .....!!!!!!!!


Purity ....is a dream now..!! Please save the EARTH ...the  RIVERS .......from  pollution ...!!!


28 May, 2011

चला वाही देस ... .....!!

चला वाही देस ....!! 
कौन से देस ..?वहां जहाँ मनुष्य के मन में प्रेम इतना प्रबल हो कि अपने अंदर ही नित्य उपजतीं  अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियां स्वतः ही दुर्बल  पड़ने लगें ..!! 
        प्रेम एक सुखद अनुभूति है ..!!किसी का हो जाना ..किसी में खो जाना ..किसी में रम जाना ही प्रेम है ..!!किसी में डूब जाना ही प्रेम है |प्रेम एक सद्भावना है जो दुर्भावना मिटा देती है |प्रेम बढ़ने पर सत-चित -आनंद -मन  होता जाता है|हलका - हलका पंछी की भांति ..मन सदा असमान पर उड़ा उड़ा सा रहता है |मन जहाँ -जिसमे लग जाये ..रम जाये ..वही प्रेम है ...|प्रेम से मेरा अभिप्राय सिर्फ किसी स्त्री-पुरुष के ही रिश्ते से नहीं है बल्कि यहाँ मैं प्रेम का वृहत रूप ..यानि अध्यात्मिक प्रेम की बात कर रही हूँ |प्रेम एक प्रवृत्ति है |सकात्मक सोच का सृजन प्रेम से होता है |कोई भी कार्य करें ,प्रेम से करें |यहाँ तक की अगर झाड़ू भी लगायें तो प्रेम से लगायें |इस प्रकार प्रेम से किया गया कार्य मन केन्द्रित करता है |प्रेम प्रबल होने पर जीने की चाह भी प्रबल हो उठती है ..!
              मन लागा मेरो यार फकीरी में ....!!कबीर का मन -''ढाई आखर प्रेम ''में ऐसा रमा कि रमता ही गया और ऐसा काव्य लिख गए पढ़ पढ़ के रहस्य में डूबता ही जाता है मन ...!!मन कहता है .....चला वाही देस ....चला वाही देस ..?कौन से देस ...?जहाँ प्रेम ही प्रेम हो और मन ही उस नगरिया का राजा  हो ...!!अरे ये कैसी सुंदर नगरिया है ...प्रेम आधार हैं यहाँ का ...!तो ..निराधार प्रेम ही समक्ष जीवन का आधार है ..!!
इसी आधार पर सच्चा प्रेम दान है ...प्रतिदान  नहीं ...!!सिर्फ देना ही प्रेम है ...!प्रभु ने प्रेम दिया हमें .. हमसे कुछ लिया तो नहीं .....!!प्रभु ने प्रेम दिया हमें ..प्रभु ने ही ये  सृष्टि रची ...प्रभु की  इस सृष्टि को  प्रभु का दिया हुआ प्रेम बांटना ही प्रेम है |प्रेम सिर्फ कल्पना ही नहीं है ...सच्चाई है कर्तव्य के रूप में ...प्रेम कर्त्तव्य है ...!!ऐसा कर्तव्य जो इश्वर हमें सिखाते हैं और समय समय पर लेते रहते हैं  हैं हमारी परीक्षा ...!!और इसी परीक्षा में सफल और निपुण होने के लिए प्रेम हमें बांधता है अपनी संस्कृति से....!!प्रेम ऐसा कर्तव्य है जो हमारी संस्कृति से हमें बांधे रखता है जीवन में सफलता पाने के लिए .. ..!!एक परिधि स्थापित करता है प्रेम ....!!
                             निर्बाध प्रेम हमें एक बंधन में बाधता है ...!!उस बंधन में जहाँ अपनी संस्कृती हमें सिखाती है -सर झुकाना ...अहंकार तोड़ना ....बड़ों का आदर करना ..प्रेम से बोलना ...प्रेम बाटना...पर ये सिखाता कौन है ...? ..पहली गुरु है अपनी माता ..प्रथम ज्ञान शिशु  माँ से पाता..... माँ से मिला हुआ अद्भुत वरदान है प्रेम |माता -पिता से मिला हुआ अद्भुत वरदान है प्रेम |ईश्वर से   मिला ...?या माता -पिता से मिला ...?देखिये ऐसे ही सिखाती है हमारी संस्कृति माता -पिता को ईश्वर का  दर्जा देना ...!!यही प्रेम है ....!प्रेम शाश्वत है ...!सत्य है ...!! अमर है ...!!
मिल जाने पर सुख और न मिलने पर विद्रोह देता है प्रेम |और इसी विद्रोह पर काबू पाना ही प्रेम है ...हिंसा को छोड़ ,अहिंसा के रास्ते जाना ही प्रेम है ...प्रेम तो अथाह सागर है  ...!! बहुत मुश्किल  से उसे गागर में भरने का प्रयास किया है मैंने ........!!!!!!और प्रयास करते रहना है शायद वही सागर अंजुली में भी भर पाऊँ ...!!



25 May, 2011

शून्य और एक की ये भाषा ......!!

ये कैसी तृष्णा है ..
कि सब पा कर भी ..
कहता है मन ...
शून्य सा ..
है कुछ भी नहीं ........!!

ये कैसी संतुष्टि है ...
अब  पा लिया सब...
एक में... रब ...!
शबनम सा है
 एक  बूँद में ......!
दिखता हो भले 
 कुछ भी नहीं .......!!!

शून्य और दस में है 
बस एक की थोड़ी दूरी ........
मैं शून्य तुम एक प्रभु ....!!
वही तुम्हारा एक का -
तुम्हारे सानिध्य का ..
अमृतमय....
तृप्ति देता हुआ.....
अमूल्य सा भाव... 
विलुप्त कर देता है - 
मन के मेरे-
सघन आभाव ........
लीन..तुममय..मैं हुई अब ...!!
तुम  में.....
तुम्हारी भक्ति में ..
आसक्ति में ...
मिली ख्याति जग में ..
और  विरक्ति जग से..........
                                       कैसे...
                                तुम्हारे स्पर्श ने-
                                      भर दिए -
                                मुझ पत्थर सी ..
                           अहिल्या में भी  प्राण.......!!
                               बढ़ते हैं मेरे पग ..
                            अब निरंतर गतिमान ....!!
                      तुम्हारी   प्रदक्षिणा  करते हुए ....!!
                                    भजते हुए  ...... 
एक तुम ही तुम हो ..
प्रभु सर्वस्व ....
मैं शून्य सी हूँ ..
तुम बिन मेरा अस्तित्व -
कुछ भी नहीं ....
तुम्हे पाकर..... 
एक और शून्य से  ..
दस बनाता जीवन.....
बढ़ता चला ......
पल -पल अग्रसर ...

सम्पूर्णता की ओर.......!!!


From  zero to ten...!!Striving for PERFECTION.....a  vision .....perfection ....!!!!!!  I see the sun shinning ...as I take the path and move ahead .......and keep moving .......and keep moving  towards you ...THE PERFECTION.