नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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19 September, 2013

ज़िंदगी मुस्कुराने लगी ...!!

रात  ढली   और ....
सुबह कुछ इस तरह  होने लगी ....!!

गुलमोहर  से रंग झरे ...……
सूरज ऐसा रोशन हुआ ...
कि मोम भी पिघलने लगी ...

आम्र की मंजरी पर बैठी कोयल ...
पिया का पतियाँ  लाई .....
कूक कूक
राग वृन्दावनी  सारंग सुनाने लगी ...

भरी दोपहर याद पिया की ..
बिजनैया जो डुराने लगी ...
कूजती रही  कोयल ...
हूक जिया की,
पल पल जाने लगी ...
निरभ्र  आसमान में ,
चहकते विहग ....
जैसे ज़िंदगी मुस्कुराने लगी ...!!

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वृन्दावनी सारंग दिन में गाए जाने वाला राग है …!!
बिजनैया -पंखा
डुराए -झुलाना .

10 October, 2012

कविता सी गुन गुन गाये ......!!

मंगल दिन .....
उज्ज्वल मन कहे ....
अनुभास सो प्रकाश छायो.......

मन रमायो.......
अनुराग है  छायो......
ले  हरी नाम ......
मन मनन गुनन की बेला ....

काहे निकला अकेला ....?




हरी मूरत जिस मन मे ...
मन कहाँ अकेला ......??
मन पंछी बन गाये ......
मन सरिता बन बह जाये .....
मन फूल बने  खिल जाये ............
मन सूरज सा ...मन रश्मि सा ....मन तारों  सा ....मन चन्दा सा .....
झर झर झरते उस अमृत सा ....!!!!!

मन मे तरंग  जब  जागे .......
कुछ स्पंदन जो  दे जाये .....
मन झूम झूम रम जाये ....
उर सरोज सा दिखलाए ......!!
कविता सी गुन गुन  गाये ......!!
कविता सी गुन गुन गाये .....!!