नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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05 March, 2015

यूं ही अनवरत .....!!

15 वर्ष यकीनन बहुत लंबा समय होता है ...किन्तु सब कुछ आज भी याद है ...स्पष्ट ...!!
माँ की याद में ...आज उनकी पुण्यतिथि पर ,उनके लिए लिखे कुछ भाव ...!!


मेरे पास आज भी
 तुम्हारे दिये हुए
देखो वही शब्द हैं माँ
वही भाव हैं ...
जिन्हें तुम सर्दी में सहेजती थीं 
धूप दिखाकर ....,
गर्मी में सहेजती थी 
उस अंधेरी कोठरी  में 
धूप से बचा कर ....
बरसात मे  तुम्ही ने सिखाई बनाना 
वो कागज़ की नाव ,
जिस पर आज भी 
तिरते हैं मेरे मन के भाव
''वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी '' 
गाते हुए ....जानती हूँ ....
मानती भी हूँ .......
तुम से मुझ तक ...
मुझ से मेरी संतति तक ....
कुछ तो है जो चलता रहेगा ....
यूं ही अनवरत .....!!

26 April, 2012

जो कभी तुम्हारा और मेरा हुआ करता था ..............

तुम्हारी ही परछाईं सी ....
तुम्हारी ही राह पर चलती हुई ...
तुम्हें अपने आप में ढूंढती हुई ....
खोजती हुई...
नित-नित पल्लवित प्रफुल्लित होती हुई ...
कृतज्ञ होती हुई ...
सोचती हूँ ...
संस्कृति सभ्यता का रूप
कभी बदला नहीं ...
सदियाँ बीत गयीं सो बीत गयीं ...
माँ का प्रारूप कभी बदला  नहीं ....
खून का रंग कभी बदला नहीं ...
ये कैसा गाढ़ा लाल रंग है ..
रग-रग में चढ़ गया है ...


उतरता ही नहीं ...
गहराता ही जाता है ...
सदियों से इसी तरह ..
शाश्वत सत्य सा ..
इसका रंग ...इसका रूप ....इसका असर ...!!

तुम मुझसे दूर होकर भी ..
कितनी पास हो गयी हो ... 
माँ ...
आज तुम्हें खोजते-खोजते ...
 .... सोचते सोचते .....
नहीं जानती कैसे ...
तुममे ऐसी खो गयी हूँ ...
पूर्णतः तुम्हीं में समाना चाहती हूँ ...
अभी  लगता है ...शायद ...
कुछ- कुछ  तुम्ही सी हो गयी हूँ ...
हर्षित है मन ये सोच कर ...
आज मेरा और बच्चों का ...
वही रिश्ता है ...
जो कभी तुम्हारा और मेरा हुआ करता था .................
एक ही आत्मा का  बहता हुआ ....अविरल प्रवाह ....
अनादी अनंत ....शाश्वत सत्य सा .........................................!!!!!!!!!!!

28 July, 2011

स्वरोज सुर मंदिर (4)

मैं सरोज तुम अम्बुज मेरे ...
सरू से दूर कमल मुरझाये ...
ईमन यमन राग बिसराए ..
यमन राग मेरी  तुमसे है ........
निश्चय ही ........!!!!
मध्यम तीवर सुर लगाऊँ .........
जब लीन मगन मन सुर  साधूँ ....
तुममे खो जाऊं ...
आरोहन -अवरोहन सम्पूरण ......!!
अब रात्री का प्रथम प्रहर..

हरी भजन में ध्यान लगाऊँ .....!!

इसी प्रार्थना से स्वरोज सुर  मंदिर की चौथी कड़ी प्रस्तुत है ..!!
सबसे पहले आभार आप सभी का इस श्रंखला में रूचि लेने हेतु ..!
मनोज जी आपने प्रश्न  पूछा था की राग और थाट में क्या अंतर है ..?
आज यहीं से इस आलेख की शुरुआत करती हूँ |आधुनिक काल में यह पद्धति थाट -राग वर्गीकरण के नाम से प्रचलन में आई |जैसा की मैंने आपको बताया था संपूर्ण रगों को ,उनके स्वर प्रयोग के आधार पर ,दस थाटों में विभाजित किया गया है |फिलहाल हम कल्याण थाट की बात कर रहें हैं |कल्याण थाट में कई राग आते हैं ..जैसे -भूपाली,कल्याण,छायानट,केदार,कामोद,गौड़ सारंग,हमीर ...इत्यादि |अब इन्हीं सब रागों से राग कल्याण पर हमने थाट का नाम भी कल्याण कर दिया |तो कल्याण थाट भी है और राग भी |अब भूपाली को लीजिये ...उसका वर्णन करते समय हम कहेंगे थाट- कल्याण ..राग -भूपाली ...|
इस प्रकार हर थाट में कोई एक ऐसा राग होता है जो राग भी है और थाट भी |फिर आगे मैं आपको बताउंगी कि हर थाट में कुछ स्वर संगतियाँ समान होती हैं |हर थाट कि कुछ विशेष बातें होतीं हैं जो उसके अंतर्गत आने वाली हर राग में झलकती है|
थाट कल्याण की मुख्य  विशेषता है तीव्र मध्यम का प्रयोग....!!
यहाँ मैं आपको पुराना लिंक भी दे रहीं हूँ उसको पढ़ने से भी थाट के बारे में समझ और बढ़ सकेगी ...!!
आगली कड़ी में हम चर्चा करेंगे कल्याण थाट की कुछ अन्य विशेषताओं के बारे में ...!!
आपके सुझाव और कुछ अन्य प्रश्न भी आमंत्रित  हैं ....!!

स्वरोज सुर मंदिर (3) क्रमशः...

ये भी पढ़ें ... परिकल्पना पर ..कुछ उनकी कुछ इनकी...
आभार..


10 July, 2011

स्वरोज सुर मंदिर (3)


मैं सरोज तुम अम्बुज मेरे ...
सरू से दूर कमल मुरझाये ...
ईमन यमन राग बिसराए ..
यमन राग मेरी  तुमसे है ........
निश्चय ही ........!!!!
मध्यम तीवर सुर लगाऊँ .........
जब लीन मगन मन सुर  साधूँ ....
तुममे खो जाऊं ...
आरोहन -अवरोहन सम्पूरण ......!!
अब रात्री का प्रथम प्रहर..

हरी भजन में ध्यान लगाऊँ .....!!

इसी प्रार्थना से स्वरोज सुर  मंदिर की तीसरी कड़ी प्रस्तुत है ..!!

नाद ब्रम्ह.....परब्रम्ह ...!!
प्रभु तक पहुँचाने का एक मार्ग  संगीत भी है  नाद के विषय में कुछ रोचक जानकारी से आज की चर्चा प्रारंभ करते हैं |आज नाद के गुण और उसके प्रकार के विषय में चर्चा करते हैं 
नाद के दो प्रकार होते हैं :
  1. आहत नाद 
  2.  अनाहत नाद .
ये दोनों ही पिंड (देह)से प्रकट होते हैं ,इसलिए पिंड का वर्णन किया जाता है |

आहत नाद :जो कानो को सुनाई देता है और जो दो वस्तुओं के रगड़ या संघर्ष से पैदा होता है उसे आहत नाद कहते हैं |इस नाद का संगीत से विशेष सम्बन्ध है |यद्यपि अनाहत नाद को मुक्तिदाता मन गया है किन्तु आहात नाद को भी भाव सागर से पार लगानेवाला बताया गया है |इसी नाद के द्वारा सूर,मीरा इत्यादि ने प्रभु-सानिध्य प्राप्त किया था और फिर अनाहत की उपासना से मुक्ति प्राप्त की ...!

अनाहत नाद ::जो नाद केवल अनुभव से जाना जाता है और जिसके उत्पन्न होने का कोई खास कारन न हो ,यानि जो बिना संघर्ष के स्वयंभू रूप से उत्पन्न होता है ,उसे अनाहत नाद कहते हैं ;जैसे दोनों कान जोर से बंद अनुभव करके देखा जाये ,तो 'साँय-साँय ' की आवाज़ सुनाई देती है
इसके बाद नादोपसना की विधि से गहरे ध्यान की अवस्था में पहुँचने पर सूक्ष्म नाद सुनाई पड़ने लगता है जो मेघ गर्जन या वंशिस्वर आदि से सदृश होता है |इसी अनाहत नाद की उपासना हमारे प्राचीन ऋषि -मुनि करते थे |यह नाद मुक्ति दायक तो है ...किन्तु रक्तिदायक नहीं |इसलिए ये संगीतोपयोगी भी नहीं है ,अर्थात संगीत से अनाहत नाद का कोई सम्बन्ध नहीं है |
  
    वास्तव में ध्वनि  का वर्गीकरण वैज्ञानिक ढंग से तीन गुणों के अधर पर किया जा सकता है :
  1. तारता अर्थात नाद का ऊँचा -नीचपन (Pitch.)
  2.  तीव्रता या प्रबलता अथवा नाद का छोटा बड़ापन (Loudness)
  3.   गुण या प्रकार (Timbre)  
चलिए  अब  लौट  चलते  हैं  राग  यमन  पर  |आपको आज राग यमन की विस्तृत जानकारी देती हूँ|
                                   राग यमन
 ठाट :कल्याण             जाती :सम्पूर्ण           समय :रात्री का प्रथम प्रहार 
वादी :ग(गंधार)           संवादी:नि (निषाद)


आरोह:   नि रे ग प धनि सां
अवरोह:  सां नि ध प ग रे सा
    मध्यकालीन ग्रंथों में यमन का उल्लेख मिलाता है |परन्तु प्राचीन ग्रंथों में केवल कल्याण राग दिखाई देता है यमन नहीं |आधुनिक ग्रंथों में यमन एक सम्पूर्ण जाती का राग माना गया है |
    राग का अध्ययन करते करते ही अब आपको राग वर्णन में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न सब्दों की जानकारी देती हूँ सबसे पहले देखें ठाट क्या है ...?
    ठाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे राग उत्पन्न हो सके | पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम काल में 'राग तरंगिणी ' के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परंपरागत 'ग्राम और मूर्छना -प्रणाली' का परिमार्जन करके मेल अथवा ठाट को सामने रखा |उस समय तक लोचन कवि के अनुसार सोलह हज़ार राग थे ,जिन्हें गोपियाँ कृष्ण के सामने गया करती थीं;किन्तु उनमे से छत्तीस राग प्रसिद्द थे |सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अंतर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचार में आ गया,जो उस समय के प्रसिद्द ग्रन्थ 'संगीत -पारिजात'और 'राग विबोध'में स्पष्ट है |इस प्रकार लोचन कवी से आरंभ होकर यह ठाट पद्धति चक्कर काटती हुई श्री भातखंडे जी के समय में आकर वैधानिक रूप से स्थिर हो गई |
    रागों का अध्ययन करने के हिसाब से सात स्वरों के प्रयोग के आधार पर ठाट का निर्माण किया गया |इस प्रकार हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अनुसार अब हम भातखंडे जी द्वारा बताये गए दस ठाट मानते हैं |जो इस प्रकार हैं:
    बिलावल ठाट :               सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (सभी स्वर शुद्ध प्रयोग)
    यमन या कल्याण ठाट : सा रे  ग  म  प  ध  नी  सां   |  (म तीव्र )
    खमाज ठाट :                 सा  रे  ग  म  प  ध  नी सां  |  (नी कोमल)
    भैरव ठाट :                    सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  ध  कोमल )
    पूर्वी ठाट :                      सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  ध  कोमल  म तीव्र  )
    मारवा  ठाट :                  सा  रे  ग  म  प  ध  नी  सां  |  (रे  कोमल  म  तीव्र  )
    काफी ठाट :                    सा  रे    म  प  ध  नी  सां  |  (ग  नी  कोमल)
    असावरी ठाट :                सा रे  म  प   नी  सां   |  (ग  ध  नी  कोमल  )
    भैरवीं ठाट :                     सा  रे म  प   नी  सां  |   (रे ग ध नी कोमल )
    तोड़ी ठाट :                      सा  रे      प    नी  सां  |  (रे  ग  ध  नी  कोमल  म  तीव्र )

    अब आप ये बात समझ सकेंगे कि राग यमन कल्याण ठाट का राग है क्योंकि उसमे म  तीव्र प्रयोग होता है |
    आज के लिए इतना बहुत है ... कोई बात समझ न आई हो तो कृपया निसंकोच पूछ लें ...फिर शीघ्र  मिलेंगे ...
    क्रमशः ........

      28 May, 2011

      चला वाही देस ... .....!!

      चला वाही देस ....!! 
      कौन से देस ..?वहां जहाँ मनुष्य के मन में प्रेम इतना प्रबल हो कि अपने अंदर ही नित्य उपजतीं  अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियां स्वतः ही दुर्बल  पड़ने लगें ..!! 
              प्रेम एक सुखद अनुभूति है ..!!किसी का हो जाना ..किसी में खो जाना ..किसी में रम जाना ही प्रेम है ..!!किसी में डूब जाना ही प्रेम है |प्रेम एक सद्भावना है जो दुर्भावना मिटा देती है |प्रेम बढ़ने पर सत-चित -आनंद -मन  होता जाता है|हलका - हलका पंछी की भांति ..मन सदा असमान पर उड़ा उड़ा सा रहता है |मन जहाँ -जिसमे लग जाये ..रम जाये ..वही प्रेम है ...|प्रेम से मेरा अभिप्राय सिर्फ किसी स्त्री-पुरुष के ही रिश्ते से नहीं है बल्कि यहाँ मैं प्रेम का वृहत रूप ..यानि अध्यात्मिक प्रेम की बात कर रही हूँ |प्रेम एक प्रवृत्ति है |सकात्मक सोच का सृजन प्रेम से होता है |कोई भी कार्य करें ,प्रेम से करें |यहाँ तक की अगर झाड़ू भी लगायें तो प्रेम से लगायें |इस प्रकार प्रेम से किया गया कार्य मन केन्द्रित करता है |प्रेम प्रबल होने पर जीने की चाह भी प्रबल हो उठती है ..!
                    मन लागा मेरो यार फकीरी में ....!!कबीर का मन -''ढाई आखर प्रेम ''में ऐसा रमा कि रमता ही गया और ऐसा काव्य लिख गए पढ़ पढ़ के रहस्य में डूबता ही जाता है मन ...!!मन कहता है .....चला वाही देस ....चला वाही देस ..?कौन से देस ...?जहाँ प्रेम ही प्रेम हो और मन ही उस नगरिया का राजा  हो ...!!अरे ये कैसी सुंदर नगरिया है ...प्रेम आधार हैं यहाँ का ...!तो ..निराधार प्रेम ही समक्ष जीवन का आधार है ..!!
      इसी आधार पर सच्चा प्रेम दान है ...प्रतिदान  नहीं ...!!सिर्फ देना ही प्रेम है ...!प्रभु ने प्रेम दिया हमें .. हमसे कुछ लिया तो नहीं .....!!प्रभु ने प्रेम दिया हमें ..प्रभु ने ही ये  सृष्टि रची ...प्रभु की  इस सृष्टि को  प्रभु का दिया हुआ प्रेम बांटना ही प्रेम है |प्रेम सिर्फ कल्पना ही नहीं है ...सच्चाई है कर्तव्य के रूप में ...प्रेम कर्त्तव्य है ...!!ऐसा कर्तव्य जो इश्वर हमें सिखाते हैं और समय समय पर लेते रहते हैं  हैं हमारी परीक्षा ...!!और इसी परीक्षा में सफल और निपुण होने के लिए प्रेम हमें बांधता है अपनी संस्कृति से....!!प्रेम ऐसा कर्तव्य है जो हमारी संस्कृति से हमें बांधे रखता है जीवन में सफलता पाने के लिए .. ..!!एक परिधि स्थापित करता है प्रेम ....!!
                                   निर्बाध प्रेम हमें एक बंधन में बाधता है ...!!उस बंधन में जहाँ अपनी संस्कृती हमें सिखाती है -सर झुकाना ...अहंकार तोड़ना ....बड़ों का आदर करना ..प्रेम से बोलना ...प्रेम बाटना...पर ये सिखाता कौन है ...? ..पहली गुरु है अपनी माता ..प्रथम ज्ञान शिशु  माँ से पाता..... माँ से मिला हुआ अद्भुत वरदान है प्रेम |माता -पिता से मिला हुआ अद्भुत वरदान है प्रेम |ईश्वर से   मिला ...?या माता -पिता से मिला ...?देखिये ऐसे ही सिखाती है हमारी संस्कृति माता -पिता को ईश्वर का  दर्जा देना ...!!यही प्रेम है ....!प्रेम शाश्वत है ...!सत्य है ...!! अमर है ...!!
      मिल जाने पर सुख और न मिलने पर विद्रोह देता है प्रेम |और इसी विद्रोह पर काबू पाना ही प्रेम है ...हिंसा को छोड़ ,अहिंसा के रास्ते जाना ही प्रेम है ...प्रेम तो अथाह सागर है  ...!! बहुत मुश्किल  से उसे गागर में भरने का प्रयास किया है मैंने ........!!!!!!और प्रयास करते रहना है शायद वही सागर अंजुली में भी भर पाऊँ ...!!



      10 May, 2011

      उठा -धराई...!!

      मैं हूँ निपट  नादान प्रभु ....!!
      कैसे लूँ तुम्हारी सुधि ...!!
      न जानू पूजा की विधि ...!
      जीवन -ग्रन्थ
       दिया तुमने ...!!
      असीम ..अनंत ...
      दिया तुमने ..!!
      अपार सम्पदा से भरी
      ये धरा ...
      जैसे ......
      मेरा घर ...मेरा तन ..
      अपने रूप पर इठलाता ...
      झूमता बरसता ये सावन ..
      मनुष्य का यौवन ...
      या .......
      बिलकुल जैसे ....
      मेरी बगिया ..मेरा मन ..
      कितना है ....
      जो तुमने मुझे दिया ..
      अब कुछ-कुछ समझ ......
      मैंने जग से ही ..
      अपना मुहं मोड़ लिया ..
      स्वाध्याय
      का प्रण लिया ...!! 
      समेट-समेट कर -
      सूखे पत्ते झाडूं.. 
      मन -अंगनवा बुहारूं ..
      मन मैल निकालूँ ... 
      तुलसी जल डारु....!!
      कैसे गुण गाऊँ ....?
      कैसे के दरसन पाऊँ ...?
      कैसे घर -द्वार -आँगन ...
      बगिया -मन - सजाऊँ ....?
      लगी हूँ इसी उठा-धराई में ...
      प्रभु अब तो पार लगाओ ..
      निपुण करो मुझे इस सफाई में ........!!!!!
       I know not much ...in fact nothing ...Oh GOD ..!Hold me and behold me as I tread ... THE PATH ...IN PURSUIT OF EXCELLENCE....towards YOU..........!!!!