नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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04 September, 2012

काग़ज़ की नाव सा ...

नहीं कोई ठाँव सा ....
काग़ज़  की नाव सा ...


बहता हूँ जीवन की नदिया में ...
शनै: शनै: डूबता हुआ  ....
क्षणभंगुर जीवन ...
किंकर क्षणों  मे ही ...
आकण्ठ डूब  जाऊँगा ...
अब तुम पर ..
सब तुम पर है ..
 पार लगाओ ...
मेरा जीवन सुधार दो ....
सँवार दो ..
अरज  बस इतनी ही है ..उद्धार करो ...!!
 हे प्रभु कल्याण करो। .!!

09 April, 2012

रीत रही मोरी प्रीत ....!!

सुर के पीछे पीछे चलना ....
सुर साधना ....
बने अगर मन की यही आराधना ...
बहुत कठिन है ये अर्चना ... ....!!

सांस तो चलती है न ....?आस आज भी जागी- जागी  सी है .... है ,पर कहीं कुछ भाव में फर्क है ....
कभी अपना गाना सुनना मन को भाता है ....
कभी अपने ही गाने में जब ढेरों कमियां दिखतीं हैं ....बहुत रियाज़ करने पर भी वो सुर नहीं आता .....जो आना चाहिए .. ...तब  व्याकुल  मन ....
कहीं ...चैन नहीं पाता .....
बस अकुलाता .....और ...तब लगता है ....



                                                 रीत   रही मोरी प्रीत ...


श्याम ने न आवन  की ठानी ...
मन  ने न बिसरावन  ठानी ....
आस से रास करत अब मनवा...
 रीत निभाए प्रीत  ...
निस दिन राह तकत अब मनवा ....
रीत  रही  मोरी प्रीत ....

श्याम के मीठे बैन ..सखीरी ...
मोरे  काजल से  नैन ...सखीरी..
मनवा न इक पल चैन ...सखीरी ...
जिया की पीड़ा सह ना पायें.....
छल-छल अँखियाँ  नीर बहायें.....
श्याम  के छल को भूल न पायें......
राह तकत पथराएँ......

 छलिया मन का मीत...

रीत रही  मोरी प्रीत .....!!

18 March, 2012

जीवन के साक्षी ....

दुर्भेद्य तम  को चीरती ...
उषा की पहली किरण ...
स्वर्णिम सी .....


नीरव एकांत में ,
जिंदगी  की आहट ...
झीगुर की आवाज़ ....
एक सांस सी ...

तृषा से व्याकुल ह्रदय ...
पा गया है ...
बस एक बूँद ,,,
स्वाति की ओस  सी ...

क्रोधाग्नि पर बरसती झमाझम ....
बस एक मुस्कान ...
ठंडक सी ...

वृहद् अरण्य पर भटकती रूह ...
मिल गयी मंजिल ...
एक डगर सी ....

डूब के  इस कोलाहल में भी ......
मेरी अनुभूति ....
एक दिव्य मौन सी ...!!

देती है प्रतीति ....
प्रत्येक क्षण में ..कण कण में ...
जीवन के साक्षी ....
तुम्हारे होने के ......
एक आभास सी ......

01 December, 2011

तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

 मैं ...अभी तो ..
 लेने का हिस्सा  हूँ ..
लेती ही रहती हूँ..
जग  से ...!!

जग  में रहकर ...
जग  से हटकर ...
जग  को  देकर ...
कुछ देने का किस्सा बनूँ....
तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

अरुण की स्वर्णिम आभा  सी
 निखर  सकूं ..
गुलमोहर  के मोहक  रंगों  सी ..
निखर  सकूँ ..

कल-कल , सरिता के शीतल  जल सी..
 बिखर  सकूँ...
मदमाती, मस्त पवन के  झोंखे सी ..
बिखर सकूं ..

रेगिस्तान में फैली हुई स्वच्छ  रेत सी
बिखर सकूँ ..
नम आँखों में बसते ख्वाबों सी ..
बिखर सकूँ..

सप्त सुरों के सरगम सी ..
निखर सकूँ ...बिखर सकूँ ...
कुमुदिनी की पंखुड़ी सी ..
निखर सकूँ..बिखर सकूँ..


निखर सकूँ ..बिखर सकूँ ..इस तरह तो ......?

 .....तो जी लूँ कुछ दिन ...!!

I know not much.....in fact nothing...............!
O GOD...!!Hold me and behold me as I tread ..THE PATH ...IN PURSUIT OF EXCELLENCE ...towards ...
YOU....THE OMNIPRESENT.....!!!!!!

24 November, 2011

मेरा प्रतिबिम्ब ही है.. जीवन ...!!


जैसा  पानी का रंग है ...
 वैसा मन  का रंग है ...
 और जीवन ..का रंग है ...
 कोई रंग ही नहीं ...
पर दिया अपना रंग मैंने इसे ...
और रंग दिया जीवन अपने ही रंग में ...


या ...
जैसा  गीली माटी का रूप है ....
वैसा मन का रूप है ....
और जीवन का रूप है ...
अपना कोई स्वरूप ही नहीं....
पर चाक पर  दिया -
एक  रूप मैंने इसे ..
और ढाल लिया जीवन..
 अपने मन के स्वरूप में ..


शीश महल की तरह ...
अपनी ही छब दिखाता है ये जीवन ....
विविध रंग-रूप में सिमटा...लिपटा..या फैला ....
मेरा  ही  प्रतिबिम्ब है  जीवन ...
मेरा ही रंग ...मेरा ही रूप ...
मेरी ही दृष्टि ...छाई चाहूं ओर...
चाहूं ओर ..मैं ही  हूँ ..
मेरे ही हर दान से मिला..
 प्रतिदान वरदान.....
हर रोध से मिला..
 अवरोध ..प्रतिरोध...
हर क्रिया  से मिली प्रतिक्रिया ...
और हर बिम्ब से मिला प्रतिबिम्ब ...
हाँ निश्चय ही .....


मेरा  प्रतिबिम्ब ही  है.. जीवन ...!!


Oct.,2011,when I was in U.K ,one of my articles was published in the news paper titled , ''The gift of music .''for  ''Thought of the week.''Please spare a few minutes if u can.Thanks.

01 September, 2011

ये दूरी क्यों है ...?

प्रभु ..हम  श्रुति ..तुम  ह्रदय ...
श्रुति से ह्रदय का ...
श्रुति  सुर -ताल  की 
हमसे  तुम्हारा...
नाता क्या है ...?
 क्यों हमारी  श्रुती  ..
तुम्हारे ह्रदय तक नहीं जाती ....?

 ..जन्म दिया ..और पीर भी दी है ...
आओगे फिर पीर हरण को ....
ऐसी एक सौगात भी दी है....!!

नयन निहारें ..
मूक ..प्रतीक्षा ...
अश्रू वाचाल हो गए हैं ...
क्लेश  ह्रदय का ...सुरसा जैसा ...
मुहँ बाए ही जाता है ...!!
 मन संतप्त
संताप अपरिमित ...!!

फिर भी अब तुम्हें  हैं ...
सहेजित   भावनाएं  समर्पित ..!!
नित्य ही द्वार तुम्हारे...
हे गणेश ..प्रथमेश ...
शीश झुकाएं......
 सुगंध गंध चन्दन लगायें..
फूल चढ़ाएं ...
सर्व गुनी  गुनवंत...
सर्व  व्यापी तुम...सर्व शक्तिमान ..
सार्वभौमिक ये रूप तुम्हारा ..
रचा हुआ यह खेल तुम्हारा ...
 हम-सब की पीर अनसुनी क्यों है ....?
बिसराओ  अपराध हमारे ...
गणनायक  पधारो..द्वारे  हमारे....
हे सुख-शांति निकेतन ...
 .हे भूपति ..भुवनपति ...बुद्धिविधाता ..बुद्धिदाता ....
ह्रदय प्रभु का
सुन लो सृष्टि का आह्वान ....
कर दो अब तो जग-कल्याण ...
अपने ही बन्दों से.... ये दूरी क्यों है ...?

http://swarojsurmandir.blogspot.com/

22 August, 2011

प्रभु कृपा करो ऐसी .......!!

कंटक जीवन पथ..
लहू-लुहान होते थे पग..
न था कोई भी रथ ..
पग-पग चलते..
बन-बन घूमे ...
जीवन की कठिनाईयों का-
करते आलिंगन ..
असुरों का  करते संहार..
दीनो का करते उद्धार ..
दे दो सबको ऐसी भक्ति ..
और मुझे दो ऐसी शक्ति ..
जब-जब तुम राम बनो...
मैं तुम्हारी सीता बनूँ..

फिर तुम संग समय रथ पर ...
अब देख रही हूँ ह्रदय विदारक शोर....
वो मार-काट स्वजनों की...
 वो कर्ण भेदता क्रंदन चहुँ ओर.......
जब अपनी ही नज़रों से
गिरता इंसान....
तुम कृष्ण बने ....
और करते थे जग का कल्याण ..

युद्ध के रथ पर-
अर्जुन का संबल बने...
ज्ञान मार्ग पर -
प्रखर चमकता चक्र दिखे ...
देते थे उपदेश जगत उत्थान का ..
रखते जब-जब ध्यान जीवन-मान का...
प्रभु कृपा करो ऐसी ..
रहे तुम्हारा वृहद् हस्त ...
कृपा तुम्हारी ..
ऐसे समय रहूँ तुम्हारे संग.
तुम्हारे अपार ज्ञान रुपी सागर में से..
पोर-पोर ज्ञान में डूबी  हुई .... 
मैं तुम्हारी बस एक बूँद गीता बनू....!!!!!!

जन्माष्टमी  के  पर्व  की  सभी  सुधि  पाठकों  को  हार्दिक  शुभकामनायें ...
 प्रत्येक मनुष्य में प्रभु का वास है ....श्री राम की भक्ति और श्री कृष्ण का ज्ञान ...इन भावों को अपने ही अन्दर जागृत करने के विचार से इस  कविता का सृजन हुआ ......अब रखो लाज गिरधारी ऐसी के हम सब मिल-जुल  ...प्रेम  बाँटते  चलें  ...ज्ञान  बंटते  चलें...!!!!!!!!