नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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17 September, 2012

हृदय के रूप .......(हाइकू)

1-
हृदय  वही  
पिघले मोम जैसा,
पाषाण नहीं । 

2-
मोम-सा मन
आंच मिली ज़रा सी ..
पिघल गया  ।
3-
प्रवाह लिये  
सरिता- सा  हृदय
बहता गया  ।
4-
छाई बादरी 
बरसती  बूंदरी ....
नाचे  मयूर .. ..

5-
मेघ -घटाएँ.
छाई उर -अम्बर
भाव बरसें ।

6-
घटा सावन ,
भिगोये तन मन ..
प्रेम बरसे 

7-
मन मीन क्यों 
आकुल रहती है
लिये पिपासा...?

8-
मेरा हृदय
आस की डोर बँधा.
पतंग बना ।


07 September, 2012

तोरी ये कारी ..कजरारी ....मतवारी .... अंखियाँ ...!!

 झील सी ...गहरी .....
बदरा सी नीर भरी ..
सावन सी भीगी ...
मृग सी चंचल ...
ज्योत्स्ना बरसाए ......
चमकें चम-चम ..
कुछ चमकीली ...
दुति दामिनि ज्यों ..
हृदय धड़काए  ....
मोरे मनवा बहुत लुभाए  ...
अंतस रच बस जाए  ...
ओ री धरा ...
तोरी  ये कारी ..कजरारी ....मतवारी .... अंखियाँ ...!!

वही धरा ....वही मैं ....वही दिन ...वही रात ....!!
सच कहूँ तो मुझे अपनी इस धरा से बड़ा प्रेम है ....!!इसका नयनाभिराम सौंदर्य मेरी आँखों मे बसा है ...!!
किसी तरह इसका सौंदर्य बना रहे ....यही प्रयास हमेशा करती हूँ ...इसी को ताकती हूँ ....इसी से प्रेरणा पाती हूँ और इस पर लिखती भी हूँ ......जैसे धरा से धरा तक ,धरा के इर्द गिर्द ही घूमता है मेरा मन .....

धरा से प्रेम है मेरा जो मुझे ये रात भी काली नगिन सी नहीं ,बल्कि कजरारी अँखियों सी प्रतीत हो रही है ...पर जानती हूँ ...मेरे भाव सदा यही थोड़ी रहेंगे ......


एक दिन   ........कुछ अलग से भाव थे मन के .........
इतनी बरसात और मन लिखता ही चला गया ...लग रहा है दोनों कविता साथ पोस्ट कर दूं ....ऐसा न हो बरसात ख़तम हो जाए ,ऋतु बीत जाए ....और मेरी कविता बिना पोस्ट किये ही रह जाए ...


                                                   क्यूँ रात बरसने आई ...??



हाय री ...
हाय री ...
आई  री ...
छाई  री .. ..
काली घनघोर अंधियरी ........
घिर-घिर आई ...घटा छाई ...

रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे ...
श्याम घनश्याम  की सुध लाई .......
मोरे मन के सागर  से नीर चुरा ...
भर-भर गागर ..झिर झिर झर ..
झर झर झर ...
भई साँझ  बरसने  आई ...

चहुँ ओर  घनघोर घटा छाई ....
कित जाऊं ...कैसे चैन पाऊं .....
श्याम की श्याम छब लाई ...
अब रात  बरसने आयी ....
मोरे मन की गागर से नीर चुरा ...
क्यूँ रात बरसने आयी ...????
हाय री ...मन तरसावन ...
जिया अकुलावन ...
बिनु श्याम ...क्यूँ आई ...?
क्यूँ रात बरसने आई ....??


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आज बरखा पर दोनों अलग भावों की कवितायें एक साथ पोस्ट कर रही हूँ ....!!


04 September, 2012

काग़ज़ की नाव सा ...

नहीं कोई ठाँव सा ....
काग़ज़  की नाव सा ...


बहता हूँ जीवन की नदिया में ...
शनै: शनै: डूबता हुआ  ....
क्षणभंगुर जीवन ...
किंकर क्षणों  मे ही ...
आकण्ठ डूब  जाऊँगा ...
अब तुम पर ..
सब तुम पर है ..
 पार लगाओ ...
मेरा जीवन सुधार दो ....
सँवार दो ..
अरज  बस इतनी ही है ..उद्धार करो ...!!
 हे प्रभु कल्याण करो। .!!

03 May, 2012

मुस्कुराती छवि तुम्हारी ...!!


तुम्हें अप्रतिहत  निर्निमेष निहार ....
भर- भर लिए  नयन ...
फिर मूँद कर पलक ...
जब-जब भी तुम्हें परखा ,देखा .........!!
दिखी ,मनः पटल पर .....
एक सुस्मित ..अमिट सी.....
बस मुस्काती सी रेखा ..........!!



तुम आये थे याद ...
यकायक जिस पल ...
कुछ पल को उद्वेलित ...
बुझ सा गया था मन .................!!
है दिव्य सी स्वानुभूति ....
अब मुस्काती छवि तुम्हारी ...
भर गया मेरे जीवन का सूनापन ...!!

बह गई काजल के संग .....
श्यामल मन की...
घन-घोर ,कारी-अंधियारी ....!!
कर  गयी उजियारी ....
मेरे क्लांत से मन को  ....
मुस्कुराती छवि तुम्हारी ...!!


प्रतिक्षण प्रतिपन्न ...
तुम्हारी संविद श्रेयमयी आभा....
जो मुझे भी प्रभासित कर देती है ...!!
वो  उज्जवल आकृति तुम्हारी ...
मरुभूमि मेरे मन की ...
किसलय सी कर देती  है ....!!
और ...अन्तः प्रज्ञा  उन्मीलित कर देती  है ....!!


*अप्रतिहत-बिना रोक टोक
*निर्निमेष -अपलक ,या बिना पलक झपके
*प्रतिपन्न-अवगत,जाना हुआ
*संविद-चेतनायुक्त
*श्रेयमयी -मंगलदायक.
*सुस्मित-मधुर मुस्कान
*उन्मीलित-विकसित