नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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28 August, 2014

प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

दादुर ,मोर ,पपीहा गायें,
...रुस रुस राग मल्हार सुनायें ,
बूंदों की लड़ियों में रिमझिम ,
गीत खुशी के झूमें आयें

टप टप गिरती,झर झर झरतीं
रिमक झिमक पृथ्वी पर पड़तीं
आयीं मन बहलाने लड़ियाँ
जोड़ें जीवन की फिर कड़ियाँ...!!

चलो बाग हिंडोला  झूलें
दिन भर के दुख फिर से भूलें...!!
ऊंची ऊंची लेकर पींगें,
मन मोरा रसधार में भींगे...!!

छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
आहा ,  प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

01 January, 2013

भावना को रूप देती प्रकृती ......



जीवन यात्रा अनवरत ...चलता चल ॥...रे मन ....!!
आँख मूँद लेने से निशा नहीं होती ...
न ही पलक खोलने से प्रात  का दिव्य स्पर्श होता है ....
समय के साथ ही हर रात की प्रात होती है ...
शाश्वत सत्य को समेटे ......
अहर्निश अपने निर्धारित मार्ग पर चलती प्रकृति .....


भावना को रूप देती ...
शब्द  को स्वरूप देती ....
आस्था को  मान देती  प्रकृति ....
जेठ  की दुपहरी में  भी ....
घनी   छांव देती प्रकृति ....!!

निर्लिप्त विस्तृत ....नील वितान ....
नीले आसमान की  ....
इस सुरमई साँझ के मौन में ....
बैलों की घंटी सी .....
मन को विश्रांति देती प्रकृति ......

पतझड़ के झड़ने में ......
मन के भटकने  में ......
नीरव से एकांत में.....
कोई आहट सी ...
पत्तों की सरसराहट सी ...
मारवा सी राग गाती प्रकृति....
पतझड़ में भी  मन वीणा को-
संवेदना के तार  देती प्रकृति ...
हर भावना को रूप देती प्रकृति.....


*************************************************************

 प्रकृति की गोद मेँ हर पल नयी उम्मीद है .......जीवन अग्रसर है ....
नूतन वर्ष सहर्ष .....
रंग और खुशबू लिपटाए ......
आप सभी के जीवन से पतझड़ हर ले जाये ....
बसंत ही  बसंत लाये ....
नवल हर्ष ...नवल पुष्प लाये ............
धरा खिली ...अंजुरी भर पंखुरी ..... ...गणनायक के   गुण   गाये .....

आप सभी को नूतन वर्ष की मंगलकामनाएं ........



05 July, 2012

बरस भी जाओ ...!!

तुम बिसर गये...
मैं राह तकूँ ...

तुम क्यों रूठे ...
मैं न जानूँ ...

तुम हृदय हीन ...
मैं न मानूँ ...

 कैसी है ये लगन ...
तृषित मन ...
तिड़क तिड़क ..
खुष्क नयन ...
बाट तके ....
अब नेह बरसाओ ....
ओ सजन .. ...बरस भी जाओ ...!!

03 May, 2012

मुस्कुराती छवि तुम्हारी ...!!


तुम्हें अप्रतिहत  निर्निमेष निहार ....
भर- भर लिए  नयन ...
फिर मूँद कर पलक ...
जब-जब भी तुम्हें परखा ,देखा .........!!
दिखी ,मनः पटल पर .....
एक सुस्मित ..अमिट सी.....
बस मुस्काती सी रेखा ..........!!



तुम आये थे याद ...
यकायक जिस पल ...
कुछ पल को उद्वेलित ...
बुझ सा गया था मन .................!!
है दिव्य सी स्वानुभूति ....
अब मुस्काती छवि तुम्हारी ...
भर गया मेरे जीवन का सूनापन ...!!

बह गई काजल के संग .....
श्यामल मन की...
घन-घोर ,कारी-अंधियारी ....!!
कर  गयी उजियारी ....
मेरे क्लांत से मन को  ....
मुस्कुराती छवि तुम्हारी ...!!


प्रतिक्षण प्रतिपन्न ...
तुम्हारी संविद श्रेयमयी आभा....
जो मुझे भी प्रभासित कर देती है ...!!
वो  उज्जवल आकृति तुम्हारी ...
मरुभूमि मेरे मन की ...
किसलय सी कर देती  है ....!!
और ...अन्तः प्रज्ञा  उन्मीलित कर देती  है ....!!


*अप्रतिहत-बिना रोक टोक
*निर्निमेष -अपलक ,या बिना पलक झपके
*प्रतिपन्न-अवगत,जाना हुआ
*संविद-चेतनायुक्त
*श्रेयमयी -मंगलदायक.
*सुस्मित-मधुर मुस्कान
*उन्मीलित-विकसित