नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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31 March, 2015

लीला धरते शब्द लीलाधर .....!!

लीला धरते शब्द लीलाधर .....!!

कभी जुलाहा बन
बुनते अद्यतन मन ....
समय  से जुड़े ,
बनाते  विश्वसनीय सेतु,


कभी खोल गठरी कपास की
बिखरे तितर बितर,
चुन चुन फिर सप्त स्वर,
शब्द उन्मेष
गाते गुनगुनाते,
बुनते धानी  चादर
गुनते जीवन
अद्यतन मन.......!!

शब्द फिर सहर्ष अभिनंदित,
स्वाभाविक स्वचालित,
सुलक्षण सुकल्पित,
रंग भरते मन
पुलक आरोहण ,
मनाते उत्स
रचते सत्व ,
लीला धरते शब्द लीलाधर .....!!

10 October, 2014

आज फिर खिलकर, बिखरा पारिजात ....!!


अजस्र सौरभ सहस्त्रधारा ,
लाई वसुंधरा
नवल सौगात !!
मेघ घटाएँ छाई
गगन में
तिरता धवल चंद्रमा,
आई शरद-ऋतु की रात  !!

आज फिर उमगी मंजुल  चंद्रिका ,
बरसे नैसर्गिक आह्लाद ,
उपवन में मेरे
सुरभित दिव्य रास 
 खिलकर निखरा ,बिखरा पारिजात ....!!


03 October, 2014

प्रगाढ़ हरित अवलंब की छत्र छाया में......



इस  विराट वटवृक्ष के   ....
प्रगाढ़ हरित अवलंब  की छत्र छाया में
सत्व पूर्ण एक नीरवता है,
अविच्छिन्न .....!!

हथेलियों पर आक्रोश
ग्रहण करती  हुई,
सायास  प्रकाश बचाने के प्रयास में 
अकंपित अविचलित रहती हूँ मैं
प्रलयकारी  इस वेग में भी .......!!

और इस तरह बचा ले जाती हूँ 
तूफान के बीच भी
अंजुरी में सँजोयी
 वो दिये की लौ
                                        जो अंततः 
उज्ज्वल कर देती है  
हमारा जीवन .......!!

*********************************************

सभी का जीवन उज्ज्वल प्रकाशमय हो ....विजयदशमी की अनेक शुभकामनायें !!                                                                                   

28 August, 2014

प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

दादुर ,मोर ,पपीहा गायें,
...रुस रुस राग मल्हार सुनायें ,
बूंदों की लड़ियों में रिमझिम ,
गीत खुशी के झूमें आयें

टप टप गिरती,झर झर झरतीं
रिमक झिमक पृथ्वी पर पड़तीं
आयीं मन बहलाने लड़ियाँ
जोड़ें जीवन की फिर कड़ियाँ...!!

चलो बाग हिंडोला  झूलें
दिन भर के दुख फिर से भूलें...!!
ऊंची ऊंची लेकर पींगें,
मन मोरा रसधार में भींगे...!!

छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
आहा ,  प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

05 May, 2014

शाश्वत अस्तित्व जीना है .......!!

धूप और छांव
दो पहलू  जीवन के
 सुख और दुख जैसे
दो पहलू प्रत्येक  मन के,
संपूर्णता या समग्रता हेतु,
कोई मिथ्या बोध नहीं,
कोई अनुमान  भी नहीं ...!!
चिर स्थाई  सद्भावना के लिये
आवश्यम्भावी है ,
अत्यंत धैर्य से सुख को जीना ,
उतनी ही प्रबुद्धता से ,
प्रचुरता से ,
दुख की सतह तक पहुंचना ,
दोनों को जीना ,
दोनों का सत्य जानना,
समझना ...अनुभूत करना ,
और फिर
बिना परखे साथ चलना ,
सत्पथ पर हर पल ,
जैसे वायु  सदा साथ रहती है
पृथ्वी की सतह पर
जीवन देने हेतु ,
नदी की सतह पर
दिशा देने हेतु ,
एक सशक्त शक्ति  लिए,
न दुख में मुख मोड़ना है,
न सुख मे प्रभु भजन  छोड़ना है ,
...बस इसी तरह
साथ चलते हुए ,
आभास से प्रभास तक
प्रत्येक प्रात की  उजास सा
मेरी अनुभूति को
प्रकृति के प्रेम की तरह ,
अपना  शाश्वत अस्तित्व जीना  है .......!!