नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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21 September, 2012

लड़ी...बूंदो की ...

लड़ी...बूंदो की ...
झड़ी ..सावन की ...
घड़ी  ....बिरहा की ... 
बात ..मनभावन की ...
रात ...सुधि आवन की .....
सौगात ......... नीर  बहावन की ......!!

07 September, 2012

तोरी ये कारी ..कजरारी ....मतवारी .... अंखियाँ ...!!

 झील सी ...गहरी .....
बदरा सी नीर भरी ..
सावन सी भीगी ...
मृग सी चंचल ...
ज्योत्स्ना बरसाए ......
चमकें चम-चम ..
कुछ चमकीली ...
दुति दामिनि ज्यों ..
हृदय धड़काए  ....
मोरे मनवा बहुत लुभाए  ...
अंतस रच बस जाए  ...
ओ री धरा ...
तोरी  ये कारी ..कजरारी ....मतवारी .... अंखियाँ ...!!

वही धरा ....वही मैं ....वही दिन ...वही रात ....!!
सच कहूँ तो मुझे अपनी इस धरा से बड़ा प्रेम है ....!!इसका नयनाभिराम सौंदर्य मेरी आँखों मे बसा है ...!!
किसी तरह इसका सौंदर्य बना रहे ....यही प्रयास हमेशा करती हूँ ...इसी को ताकती हूँ ....इसी से प्रेरणा पाती हूँ और इस पर लिखती भी हूँ ......जैसे धरा से धरा तक ,धरा के इर्द गिर्द ही घूमता है मेरा मन .....

धरा से प्रेम है मेरा जो मुझे ये रात भी काली नगिन सी नहीं ,बल्कि कजरारी अँखियों सी प्रतीत हो रही है ...पर जानती हूँ ...मेरे भाव सदा यही थोड़ी रहेंगे ......


एक दिन   ........कुछ अलग से भाव थे मन के .........
इतनी बरसात और मन लिखता ही चला गया ...लग रहा है दोनों कविता साथ पोस्ट कर दूं ....ऐसा न हो बरसात ख़तम हो जाए ,ऋतु बीत जाए ....और मेरी कविता बिना पोस्ट किये ही रह जाए ...


                                                   क्यूँ रात बरसने आई ...??



हाय री ...
हाय री ...
आई  री ...
छाई  री .. ..
काली घनघोर अंधियरी ........
घिर-घिर आई ...घटा छाई ...

रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे ...
श्याम घनश्याम  की सुध लाई .......
मोरे मन के सागर  से नीर चुरा ...
भर-भर गागर ..झिर झिर झर ..
झर झर झर ...
भई साँझ  बरसने  आई ...

चहुँ ओर  घनघोर घटा छाई ....
कित जाऊं ...कैसे चैन पाऊं .....
श्याम की श्याम छब लाई ...
अब रात  बरसने आयी ....
मोरे मन की गागर से नीर चुरा ...
क्यूँ रात बरसने आयी ...????
हाय री ...मन तरसावन ...
जिया अकुलावन ...
बिनु श्याम ...क्यूँ आई ...?
क्यूँ रात बरसने आई ....??


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आज बरखा पर दोनों अलग भावों की कवितायें एक साथ पोस्ट कर रही हूँ ....!!


10 June, 2012

मेघ घटाएं छाई गगन में .......!!

ग्रीष्म की भीषण तपन से ,
भले ही जलता रहा जिया ...!
हे भुवन पति ...
जब तुमने ही दी,
ग्रीष्म की झुलसाती पीड़ा....
धरा हूँ ...धरित्री बन मैंने धैर्य धारण किया ...!


मेघ घटाएं छाई गगन में ...
घनश्याम ....
श्याम घन सी ....
घन घन घोर घटा सी ... ..
मेरे मन की पीड़ा ....
अबोली निर्झर सी ...
अंसुअन की लीला ....
तुम कैसे समझे ....?

घिर घिर कर चहुँ ओर ....
छा गए घनघोर ....
देखती हूँ आकाश जब ..
दिखती है ..
स्मित आकृति तुम्हारी ..
जैसे कहती हो ..  मुझसे .....
''मैंने भर  दी  है ...
तुमसे लेकर ....
इन घने  मेघों  में  ...
तुम्हारी सघन   पीड़ा ......
भेजा है अपने मन मयूर को तुम तक ....
लिखकर पाती ..जीवन के रंगों की ...
भरकर उसके पंखों में .....
.तुम्हीं से  तो जीवन के रंग हैं .
ढूंढ लोगी न मुझे ...?''

आहा .... ...
मिल गया तुम्हारा संदेसा ...
बरस रहे हो तुम ....
भीग रही हूँ मैं ....
मोर की पियु पियु  ..
आह्लादित है चंचल मन ...
ये मयूर का नृत्य देख .....
झूम उठा है ....
भीगे मौसम सा भीगा-भीगा ...
चहकता ...खिलखिलाता  बावरा  मन  ....!!!!


 ग्रीष्म हो या हो वर्षा ...
झुलसती या भीगती ...
कण कण में व्याप्त तुम्हारी ही आभा है ...
रोम रोम में समाये हुए हो तुम ......!!