''ज़िंदगी एक अर्थहीन यात्रा नहीं है ,बल्कि वो अपनी अस्मिता और अस्तित्व को निरंतर महसूस करते रहने का संकल्प है !एक अपराजेय जिजीविषा है !!''
नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!
नमष्कार..!!!आपका स्वागत है ....!!!
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22 June, 2016
16 August, 2014
07 July, 2012
बनरा मोरा ब्याहन आया .....!!
री सखी ...
देख न ..
सुहाग के बादल छाये ....
झड़ी सावन की लागि ...
माथे लड़ियन झड़ियन बुंदियन सेहरा ...
देख न ..
सुहाग के बादल छाये ....
उमड़ घुमड़ घिर आये ...
सरित मन तरंग उठे....
हुलसाये ...!!
झड़ी सावन की लागि ...
माथे लड़ियन झड़ियन बुंदियन सेहरा ...
गले मुतियन बुंदियन हार पहन .....
बनरा मोरा ब्याहन आया ...!
मन उमंग लाया ....
जिया हरषाया ...
सलोना सजन
सलोना सजन
धर रूप सावन आया ....!!
धरा पलक पुलक छाया ..
हिरदय हर्षाया ....!!
बनरा मोरा ब्याहन आया ....!
संगीत मे बंदिशों के बोल इसी प्रकार के होते है .......जिनको गाते गाते अनुभुति की एक माला सी बनने लगती है .....जिनका अर्थ शाब्दिक रह ही नहीं जाता ....!!भाव का समुंदर बन जाता है और हम गाते गाते ना जाने कहाँ बह जाते हैं .... ............बस श्रुति ही ध्यान रहती है ...!!बनरा की प्रतीक्षा कर रही बनरी ....या वर्षा की प्रतीक्षा कर रही धरा .....या राग के सधने की प्रतीक्षा कर रहा है मन ....या ...कविता के और निखरने की प्रतीक्षा कर रहा है कवि ....या ....अरे अब इस अनुभुति मे ना जाने क्या क्या जुड़ जाये .....
यही अनुभुति .....यही स्पंदन तो संचार है जीवन का .....
धरा पलक पुलक छाया ..
हिरदय हर्षाया ....!!
बनरा मोरा ब्याहन आया ....!
संगीत मे बंदिशों के बोल इसी प्रकार के होते है .......जिनको गाते गाते अनुभुति की एक माला सी बनने लगती है .....जिनका अर्थ शाब्दिक रह ही नहीं जाता ....!!भाव का समुंदर बन जाता है और हम गाते गाते ना जाने कहाँ बह जाते हैं .... ............बस श्रुति ही ध्यान रहती है ...!!बनरा की प्रतीक्षा कर रही बनरी ....या वर्षा की प्रतीक्षा कर रही धरा .....या राग के सधने की प्रतीक्षा कर रहा है मन ....या ...कविता के और निखरने की प्रतीक्षा कर रहा है कवि ....या ....अरे अब इस अनुभुति मे ना जाने क्या क्या जुड़ जाये .....
यही अनुभुति .....यही स्पंदन तो संचार है जीवन का .....
स्नेही पाठकगण ...यदि आप मेरा काव्य संग्रह अनुभुति खरीदना चाहें तो फ्लिप कार्ट पर निम्नलिखित लिंक पर जा कर खरीद सकते हैं ...!
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बहुत आभार .....अगर पढें तो उसके विषय मे दो शब्द कहना ना भूलें ......!!मेरे लिये वही प्रभु प्रसाद है ....!!!!
बहुत आभार .....अगर पढें तो उसके विषय मे दो शब्द कहना ना भूलें ......!!मेरे लिये वही प्रभु प्रसाद है ....!!!!
10 June, 2012
मेघ घटाएं छाई गगन में .......!!
ग्रीष्म की भीषण तपन से ,
भले ही जलता रहा जिया ...!हे भुवन पति ...
जब तुमने ही दी,
ग्रीष्म की झुलसाती पीड़ा....
धरा हूँ ...धरित्री बन मैंने धैर्य धारण किया ...!
मेघ घटाएं छाई गगन में ...
घनश्याम ....श्याम घन सी ....
घन घन घोर घटा सी ... ..
मेरे मन की पीड़ा ....
अबोली निर्झर सी ...
तुम कैसे समझे ....?
घिर घिर कर चहुँ ओर ....
छा गए घनघोर ....
देखती हूँ आकाश जब ..
देखती हूँ आकाश जब ..
दिखती है ..
स्मित आकृति तुम्हारी ..
जैसे कहती हो .. मुझसे .....
''मैंने भर दी है ...
तुमसे लेकर ....
इन घने मेघों में ...
इन घने मेघों में ...
तुम्हारी सघन पीड़ा ......
भेजा है अपने मन मयूर को तुम तक ....
लिखकर पाती ..जीवन के रंगों की ...
भरकर उसके पंखों में .....
.तुम्हीं से तो जीवन के रंग हैं .
ढूंढ लोगी न मुझे ...?''
ढूंढ लोगी न मुझे ...?''

आहा .... ...
मिल गया तुम्हारा संदेसा ...
बरस रहे हो तुम ....
भीग रही हूँ मैं ....
मोर की पियु पियु ..
मोर की पियु पियु ..
आह्लादित है चंचल मन ...
ये मयूर का नृत्य देख .....
झूम उठा है ....
भीगे मौसम सा भीगा-भीगा ...
चहकता ...खिलखिलाता बावरा मन ....!!!!
ग्रीष्म हो या हो वर्षा ...
झुलसती या भीगती ...
भीगे मौसम सा भीगा-भीगा ...
चहकता ...खिलखिलाता बावरा मन ....!!!!
ग्रीष्म हो या हो वर्षा ...
झुलसती या भीगती ...
कण कण में व्याप्त तुम्हारी ही आभा है ...
रोम रोम में समाये हुए हो तुम ......!!
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