एक पल को रूकती है चिड़िया ...
वृक्ष की डाल पर ..
कुछ विश्रांति चाहती है ...
सुस्ता कर थोड़ा ...
अगले ही पल ...
फुर्र ररर से उड़ जाती है ...
आँख से ओझल हो जाती है ....
एक क्षण के भाव मेरे ...
आते हैं ...
रुकते हैं ...
शब्द दे जाते हैं ...
अगले ही पल ..
फुर रर से उड़ जाते हैं ...
एक पल की कविता बनती है ...
आती है ..
रूकती है.....
कुछ देती है मुझे ....
उंगली थाम ...
फिर कुछ जमने सी लगती है ...
सतत ...कुछ जुड़ने सा लगता है ...
मन कुछ बुनने सा लगता है ...
अरे .....सृजन की परिकल्पना लिए ...
नीड़ का सपना लिए ...
अब तो यह चिड़िया घर आने लगी है ..
रोज़ आने लगी है ...
पीछे अलमारी के ऊपर
कुछ सूखे घास का कचरा लाने लगी है ...
सफाई कर-कर के मैं परेशान ....
बिचारी चिड़िया भी हैरान ....
सोचती है ....
''कविता लिखतीं हैं ....
भाव पढ़ लेतीं हैं .....
इन्हें क्यों मेरे भाव समझ नहीं आते ....?
इन्हें क्या मेरा प्रेम समझ नहीं आता ...?''
किन्तु ...मैं भी सफाई पसंद..
धुन की पक्की ....
बन नहीं पाया वह घोंसला मेरे घर के अन्दर ....!!
मैं समझ नहीं पाई थी भाव चिड़िया के ...
निष्ठुर मन मेरा जीत गया ...!!
अंततः ...ज़िद छोड़ देती है चिड़िया .. ...
प्रेम जो करती है ...मुझसे ...
और अपनी परिकल्पना से ...
अब देखती हूँ ......
पीछे बगीचे में
हारसिंगार के पेड़ पर .. एक नीड़ बनाने लगी है ....
ओह ....अब ध्यान से देखती हूँ ....
चिड़िया-चिड़वे का कर्तव्यनिष्ठ प्रेम ....
नन्हें नन्हें बच्चों का कलरव ...
मन मोह लेता है मेरा ...
हार के हार नहीं मानी थी चिड़िया ....
उसकी इस प्रबल जिजीविषा के आगे मैं हार गयी .......
निष्ठुर मन ..मोम सा बन ..
चिड़िया की आस्था देख ...
पिघल ही गया ...
अब रोज़ देखती हूँ चिड़िया को ......
कितना देती है मुझे .....
भर देती है झोली मेरी ...
अनमोल से भावों से ......
जुड़ सी गयी हूँ इस चिड़िया से ...
क्या यही प्रेम है प्रभु ......?
क्या इसी भाव से उपजती है कविता ....?
क्या इसी को जीवन कहते हैं ...?