नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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01 February, 2013

पतझड़ से भला मैं क्यों डर जाऊंगा ...

इंसान  की इंसानियत के साथ
जीता ...जागता ..लहलहाता ...
खड़ा हूँ यहाँ ...इसी जगह ...
सदियों से ...!!

देखे हैं धरा पर ...
मौसम के कई  रूप  ..
आज फिर देख रहा हूँ ...
 वही मौसम का  बदला हुआ स्वरूप ..
पतझड़ से भला मैं क्यों डर जाऊँगा ....?

ए हवा .. सायं सायं चलती है ..
इठलाती ..करती अटखेली है .....
प्रेम से छूकर मुझे यूँ  यक-बयक
दूर चली जाती है ...
अब शूल से चुभाती है ....!!
चलती है तो चल ...पुरज़ोर  चल 
यूँ मुझे न डरा ...
आंधी से ....तूफान  से ...
लड़ता चला हूँ ......
अडिग खड़ा हूँ ....

मैं बरगद का पेड़ हूँ ..
कोई हरी ..पीली पात नहीं ..
जो संग तेरे उड़ जाऊँगा ...
पतझड़ से भला ..
मैं क्यों डर जाऊँगा ....?  

13 May, 2012

ये जीवन की अनगिन कहानी गहूँ मैं ...!!

13thMay ..माँ आसपास ही हैं आज ....!
१३ मई....:)  खुश होने की बहुत सारी  वजह हैं आज .......!
*मदर्स डे
*गुरु जी ,श्री श्री जी ,का जन्मदिन
*एक और है जो आप पोस्ट पढ़ कर अंदाज़ा लगा लेंगे ....!


........आज सोच रही हूँ ,समय किस रफ़्तार से भागता है ..?
जितना गुजार गया अब उतना तो बाकी नहीं है |जो भी जीवन दिया माँ  ,तुमने  ......भरपूर जिया है अभी तक ....!विभिन्न घट जीवन के ,सुख के ...दुःख के ...हँसी के ..आंसू के ......भर रही हूँ  ...धीरे धीरे ...!
बस ....कृतज्ञ हूँ ...!!
सच कहूँ तो ....मन तो बच्चा ही है अभी  भी ...!अभी  तो बहुत कुछ करना है .....अभी तो बहुत दूर जाना है ............जीना है जीवन भरपूर ...स्वयं और स्वजनों के लिए भी ..........अगला जन्म लेने से पहले .....अलंकृत करना है ...... नेह से स्वयं को और स्वजनों को भी ......तुम्हारी तरह बनना है माँ ...!!इसलिए प्रभु से हर पल प्रार्थना करती हूँ ...उजला कर देना , प्रभु मन ....यही कामना है ...!ताकि तुम्हारे पास आऊँ तो तुम्हें शिकायत का मौका न मिले ....!!


                                      **************************************************

                                       ये जीवन की अनगिन कहानी गहूँ मैं ...!!

स्वर की कल्पनातीत  उड़ान .....
एक आशातीत  मुस्कान ...
यही है   जीवन  ..!

 इक पल , इक बूँद सी बन ...
देती स्पंदन .....!
या सूरज की स्नेहिल  किरण ....
 बनी नारंगी रंग ...
रंगे   जीवन ....
रंगे   तन-मन ....!!

कभी मन जो डोले ..
हवा सी उडूँ मैं ......!!

कभी मन जो उमड़े ...
घटा सी घिरूँ मैं ...
बरसती झमाझम ..
कभी मन जो बोले ...!!
ये भेद जिया के ...
यूँ हंस-हंस के खोले ...!!


मरू में बनाऊं..
मैं अपना ठिकाना ...
तरू में समाऊँ ...
मैं दूं आशियाना ...
है आकाश मेरा ..
मैं उन्मुक्त पाखी ...!!
उडूँ यूँ मैं देखूं ..
धरा की ये झांकी ....

ये जीवन बसा है ,
समाया है मुझमे ...
बहूँ बन के नदिया..
 रवानी बनू मैं ...
ये जीवन की अनगिन
कहानी गहूँ मैं ...!


10 February, 2012

ये जीवन ...तुम्ही से मिला ....!!

पुनः उर्जा संचारित हुई ...
पूर्व से उदय हुआ प्रकाश ...
मिथ्या से दूर ...
शाश्वत सत्य के पास ...
कर  रही  थी राग का अभ्यास ..
राग पूर्वी ....सुनते  हुए.. हुआ आभास ...
सूरज  का पूर्व  से ..
मन का पूर्वी से  ..
कैसा अनादी ..अनंत ..अपूर्व रिश्ता है ...!!
जैसे पहली बार सुनकर भी ..
कोई राग सुनी हुई क्यों लगती है ...?

पहली बार देख कर भी ..
कोई जाना पहचाना क्यों लगता  है ...?
पहली बार मिलकर भी ..
कोई चिर परिचित क्यों  लगता है ...?
पहली बार पढ़ कर भी ..
कुछ  शब्द मन में बसे हुए ...
रचे  हुए क्यों लगते हैं ....?????

जीवन की यात्रा ...
जो सदियों से चल रही है ...!!

कुछ नया नहीं है ...
आती-जाती  सांस  है बस ...
पल का साथ है बस ...
कुछ आंसू ...जो जिंदगी हमें  देती है ...
फिर भी  ... हम दे सकें  जिंदगी को ...
एक  मुस्कान है बस ..!!


कहाँ से आते हैं ये भाव ......
जो कभी जिए ही नहीं ...?
कहाँ से आते हैं वो शब्द ...
जो कभी गढ़े ही नहीं .......?

ओह विस्मित हूँ ...जब देखती हूँ ....
मेरा अपना कुछ भी नहीं ....
करती रही हूँ .. सतत प्रयास ...
फिर भी ...
मेरे बस में कुछ भी नहीं ...
न देना ..न पाना ...
न प्रेम ...न बैर ...
न सुख ..न दुःख ..
न समर्पण ..न अहंकार ...
न स्मृति ..न विस्मृति ..
न क्रिया ....न प्रतिक्रिया ...
बस संचयन  ही कर पायी हूँ अपने भीतर ...
अब तक ...तुम्हारा ही दिया ...!!
ये रंग ये रूप ..
ये छाँव ये धूप
रक्षक भी तुम ही हो प्रभु .....!!
ये मन ..ये जीवन ...तुम्ही से मिला ....!!

*पूर्वी-राग का नाम है 

25 January, 2012

मेरा मन अब श्वेत है ...सब रंग लिए ...!!

षडज  का स्वर ...
दिए की कंपकंपाती लौ सा ...
घंटों ...परिश्रम...
बस षडज  पर खड़े रहना ...
और इस कम्पन के
स्थिर होने का इंतज़ार  करना.....!!

मूँद कर पलकों को .
चंचल बन ..
लो उड़ चला मन ..
केसरिया सा .. ...
षडज के शुभ्र मेघ  के संग संग ...
आज आई हूँ तुम्हारे देस ..
गाते हुए राग देस ...
यहाँ सब शुभ्र..श्वेत ...स्निग्ध है ...
किन्तु चंचल है प्रकृति मेरी  ....
जैसे राग देस की ...
बरसों इंतज़ार के बाद ...
छोटा ख्याल और मध्य लय....
अब पहुँच गयी हूँ तुम्हारे आँगन ..
अच्छा लगा इन राहों से गुज़रना ...
थम कर थाम लेना उंगली स्वरों के  ...
मन के भावों की ...
रुक कर रोक  लेना बहती हुई हवा को ....
सुरों की तरंगों को ...!!

भीग कर भिगो देना 
अपने रंग में तुम्हारा अंगना ...
जैसे रंग बिरंगे फूलों पर ..
उड़ती हुई...
सफ़ेद तितलियों को ..
अपने  भावों के स्पर्श  से   ...
रंग बिरंगा कर दिया है मैंने ....
तुम्हारा  मौन बोलता है अब... 
तुम्हारे मन के किसी एक कोने में..
मुझे अपना रंग दिखता है अब ...
और  यहाँ पहुँच कर ...
श्वेत कमल......!!
मेरा मन अब श्वेत है ...सब रंग लिए .......
अपनी  झोली   में ....!!
हर्षित है मन ..
षडज भी स्थिर है अब ...!!

*षडज-सा को शास्त्रीय संगीत में षडज कहते हैं.
*देस- राग का नाम है और इसकी प्रकृति चंचल है इसलिए उपशास्त्रीय संगीत में इसका बहुत उपयोग होता है ।चंचल प्रकृति होने के कारण ....शास्त्रीय संगीत मैं मध्य लय की बंदिशें ही  हैं ।

18 January, 2012

लो फिर आई है चिड़िया ........!!

भोर से पहले ही उठ जाती
सूखे सूखे त्रिण चुन लाती
बुलबुल सी उड़-उड़ ...
रे मन चुलबुल ...
बाग़ में चहचहाई  है चिड़िया
मन भाई है चिड़िया ..!!
लो ,फिर आई है चिड़िया....

राग विभास की आस .....
चुने हुए शब्द विन्यास ....
सींचती-उलीचती ....
घट भर-भर लायी है चिड़िया ...

सृष्टि पर बिखरा ...
सुरों के  रंगों का..तरंगों  का ..उमंगों  का   .
राग लालिल सा  लालित्य ..
बुन-बुन गुन लायी है चिड़िया ......
राग के ख्याल में खोयी  हुई ...
कुछ जागी सी कुछ सोई हुई ...
सुलक्षण  सुमंगल परंपरा निभाती ...
दिए की बाती ...
पूजा की थाली में ..
ज्यों  जलती जाती .....
पञ्च तत्व..
से पांच सुरों का राग गाती  ....
सुध बुध बिसराती..उन्माती ........
माघ के आगमन पर ..
मन के आँगन पर ..
सुघड़ नीड़ पर...
बैठी  झूलती .... इतराती ....मुस्काती ...सुस्ताती है चिड़िया  ...
अब लो फिर आई है चिड़िया ...!!!!


*विभास और ललित ये दोनों राग सूर्योदय से पहले गए जाने वाले राग हैं ...
*सुरों की उत्पत्ति भी पञ्च तत्वों से ही होती है ...
*राग  विभास  में  पांच स्वरों का प्रयोग होता है...पंचम जाती का राग है ...!!

15 January, 2012

क्या यही प्रेम है प्रभु ......?


एक पल को रूकती है चिड़िया ...
वृक्ष की डाल पर ..
कुछ विश्रांति चाहती है ...
सुस्ता कर थोड़ा  ...
अगले ही पल ...
फुर्र ररर से उड़ जाती है ...
आँख से ओझल हो जाती है ....
एक क्षण के भाव मेरे ...
आते हैं ...
रुकते हैं ...
शब्द  दे जाते हैं ...
अगले ही पल ..
फुर रर  से उड़ जाते हैं ...


एक पल की कविता बनती है ...
आती है ..
रूकती है.....
कुछ देती है  मुझे ....
उंगली थाम ...
फिर कुछ जमने सी लगती है ...
सतत ...कुछ जुड़ने सा लगता   है ...
मन कुछ बुनने सा  लगता   है ...
अरे .....सृजन की परिकल्पना लिए ...
नीड़ का सपना लिए ...
अब तो  यह चिड़िया घर आने लगी है ..
 रोज़ आने लगी है ...
पीछे अलमारी के ऊपर
कुछ सूखे घास का कचरा लाने लगी है ...
सफाई कर-कर के मैं परेशान ....
बिचारी चिड़िया भी हैरान ....
सोचती है ....
''कविता लिखतीं हैं ....
भाव पढ़ लेतीं हैं .....
इन्हें क्यों मेरे भाव समझ नहीं आते ....?
इन्हें क्या मेरा प्रेम समझ नहीं आता ...?''
किन्तु ...मैं भी सफाई पसंद..
धुन की पक्की ....
बन नहीं पाया वह घोंसला मेरे घर के अन्दर ....!!
मैं समझ नहीं पाई थी भाव चिड़िया के ...
निष्ठुर मन मेरा जीत गया ...!!
अंततः ...ज़िद छोड़ देती है चिड़िया .. ...
प्रेम जो करती है ...मुझसे  ...
और अपनी परिकल्पना   से ...
अब देखती हूँ ......
पीछे बगीचे में
हारसिंगार के पेड़ पर .. एक नीड़ बनाने लगी   है ....
ओह ....अब ध्यान से देखती हूँ ....
चिड़िया-चिड़वे का कर्तव्यनिष्ठ  प्रेम ....
नन्हें नन्हें बच्चों का कलरव ...
मन मोह लेता है मेरा ...
हार के हार नहीं मानी थी चिड़िया ....
उसकी इस प्रबल  जिजीविषा के आगे मैं हार गयी .......
निष्ठुर मन ..मोम सा बन ..
चिड़िया की आस्था देख ...
 पिघल ही गया ...
अब रोज़ देखती हूँ चिड़िया को ......
कितना देती है मुझे .....
भर देती है झोली मेरी ...
अनमोल  से भावों से ......
जुड़ सी गयी हूँ इस चिड़िया से ...
क्या यही प्रेम है प्रभु ......?
क्या इसी भाव से उपजती है कविता ....?
क्या इसी को जीवन कहते हैं ...?


13 January, 2012

पिया गुनवंत आवन को हैं ...!!

सप्त स्वरों के
 पंख लगा कर ..
मन को मन की
चाह बना कर ...
तीव्र मध्यम को -
मार्ग विहाग का मार्ग दिखा कर ...
लो उड़ चली मैं ....

उड़-उड़
भर रहा है मन ...
स्वरों में सर्वप्रथम ..
रम-रम
 प्रभु का अज्ञेय स्मरण  ..
गूँज गूँज
भंवरें का अथाह गुंजन ...
लहर लहर
 लहरों का अजेय स्पंदन ..
कल कल कल
नदिया का अमिय वंदन...
या मस्त पवन का
आनंदातिरेक  अगाध आलिंगन ..

अब घर आई ..
चतुरंग की चतुराई ...
भज मन भजन की शहनाई ..
बड़े ख़याल सी रुकी रुकी ठहरी ठकुराई ...
छोटे ख़याल सी अल्हड़ चपलाई चंचलताई ....
कजरी की अकुलाई  तरुणाई...
आली मोरे अंगना आज ...
पिया गुनवंत आवन को हैं ...
प्रिय  के रंग चूनर रंगाई....
आज मोरे मन ने सुरों के  रंगों से
  रंगोली भी सजाई .....!!


*मार्ग विहाग -राग का नाम है जिसमे तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है .
चतुरंग -शास्त्रीय संगीत में गीत का एक प्रकार है .बंदिश के बोल,सरगम,त्रिवट और तराना ....इन सभी का मिश्रण हो तो चतुरंग बनता है और चतुराई से ही गाना पड़ता है |बड़ा ख्याल ठहर ठहर कर गया जाता है ....छोटा ख्याल चंचलता से और कजरी को गाते हुए तरुनाई जैसे ही कुछ भाव होने चाहिए .....!!

आप सभी को संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें.
सूर्य देवता ने अपना मार्ग बदल लिया है ....!!उत्तरायण की ओर अब चल पड़े हैं  ...!
आज के दिन तिल गुड़ खाएं और गुड़ की ही तरह मीठा बोलें ....पता नहीं किस रूप में होगी पर ...प्रभु कृपा ज़रूर होगी ....!!ज़रूर होगी .......

15 November, 2011

कितने दिनों की प्रतीक्षा बाद ...!!


कितने  दिनों की -
प्रतीक्षा  बाद ...
जब  सुनी  वो -
ममतामयी ..करुणामयी ..
अविरल ..अनवरत ...
अनाहत नाद ...!!!

सौभाग्य के बादल...
उमड़-घुमड़ कर ..
घन घन करते ...ढोल बजाते ....
खोले जब उर के द्वार ...!
देखा ...........

नवरंग से दुकूल लिए ...
सप्त रंग बहार लिए ..

श्रुति में द्युति लिए ...
पाहुना घर आया है ...!!!!!!

हाँ ..उसी के लिए ही मैंने -
 भुवन सजाया है ..!

देखो भवन  मेरा -
रंगीन सुकृति से सजा है ...!

झड़ गयी है धूल -
कई दिनों से पसरी थी ..
मनः पटल पर... जमी थी जो ....
ढेरों..ढेरों  परतें उसकी ...!!

बगिया मेरी, छिटकी हुई-
कुछ बूँद पश्चात्  ही ..
हरी-भरी ...
साफ सुथरी सी 
लग रही है ...!!

कोने कोने में-
अहेतुक बिखर गयी है ..
संविद मुस्कान मेरी ... 
अज्रस  उर्जा से संचारित -
मेरे मन की सरिता -
बढ़ गयी है -
एक नए आवेग से -
अगले पड़ाव पर -
जीवन के कुछ नए आयाम पाने के लिए.....!!




*अहेतुक -अकारण 
*संविद- चेतनायुक्त
*अज्रस  -बिना रुके या लगातार 

27 October, 2011

एक मुट्ठी माटी.......!!!!!


  अपने मन...वतन 
और  संस्कारों की
एक मुट्ठी माटी....
हाथ में बटोर कर ...
समेट  कर ...
कर ली बंद मुट्ठी ...

हाथ बंद मुट्ठी ...
पैर जीवन पगडण्डी पर ...
चल रही है अनवरत ..जीवन यात्रा ...
पड़ी कुछ वर्षा की बूँदें.....
मुझ पर ....
भीगी सी माटी....
सोंधी सी खुशबू ...

देखते ही देखते ...
खिल गयी कुछ कोमल कोपलें ...
समेट ली थी माटी ...
अब सहेजना है ...
इन्हीं कोमल कोपलों का जीवन ...!!!!!!!!!!!!


दीपोत्सव  पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें .......
शुभ ज्योति...नवल ज्योति....
ज्यों ...ज्यों ...
बिखेरे अपनी कीर्ति....
 बनी रहे परस्पर सबमे  स्नेह और प्रीती ...!!
इसी भावना से एक क्षमा याचना है कि कुछ दिनों से अपने गायन के सिलसिले में उलझी रही और ब्लोगिंग से दूर रही |अब पुनः अपने देश वापस आने पर कविताओं का सफ़र जारी रहेगा .... अपने विचारों से अवगत कराते   रहिएगा ....वही उर्जा कुछ नया लिखने को प्रेरित करती है ...!!आभार...

24 September, 2011

सूरज साथ है मेरे .....!!

उड़ान ...!!
 कहते हैं अब रात हो गयी ...
अन्धकार छा गया ...
किन्तु रात के  इस अन्धकार में भी ...
मेरी  यात्रा  तो  जारी  है...
मैं पंछी बन उड़ चली हूँ ....
दूर देस.....
पूनम के चाँद को खिलते हुए ...
देख रही  हूँ .... सोच रही हूँ .... 

दिव्य ऊष्मा  का  दिव्य  रूप ...
सूरज  साथ  है  मेरे ...
पहुँचाता है किरणे अपनी मुझ तक....
तुम साथ हो मेरे .....!!
रात्रि के सर्वत्र व्याप्त तम   में  भी  ....
जैसे  रूप  बदल कर  ...!

इस चांदनी में ...
महसूस होता  है मुझे ....
स्निग्ध   सा..
बरसता ...मुझ  पर ...
शांत  ...शीतल  ...निर्विकार......
मन के पोर-पोर तक रिसता हुआ ...
अपार  ठंडक  देता   हुआ  ...
सूरज  साथ  है  मेरे ....!!!!!

27 November, 2010

23-धूप-- छाँव



उल्लासित जीवन जीने का -
सतत प्रयास करती रही -
कभी धूप 
कभी छाँव  के मौसम से -
निरंतर गुज़रती रही -
ज़िन्दगी से प्रीत निभाती रही .


छुप जाती थीं जब सूर्य की -
दिव्य उष्म प्रकाश की
अलौकिक रेखाएं -
आच्छादित थीं रवि -आभ पर -
छाँव  लाती हुई -
अलक सी घटायें -
ठगी सी निर्निमेष निहारती थी -
अपलक मेरी पलक -
वही अलक सी घटायें -
छाई थी मेरे मन पर क्यों -
कारी -कारी अंधियारी लाती हुई -
वही अलक सी घटायें -
उस पर दामिनी -
दमक- दमक कर -
मन डरपा जाती थी -
बीतते न थे-
पल-पल गिनते भी -
दुःख के करील से क्षण .....!!
मनन करता था मन -
करता था पुरजोर अथक प्रयास -
ढूंढता था तनिक आमोद-प्रमोद
आल्हाद और उल्लास ...!!


है यह नियति की परिपाटी -
सुख के बाद -
अब दुःख की घाटी
हर एक मोड़ जीवन का
ले लेता जैसे अग्नि परीक्षा -
पर हो कर्तव्य की पराकाष्ठा -
और अपने ईश पर घनीभूत आस्था -
हे ईश -ऐसा दो शीश पर आशीष
जी सकूँ निर्भीक जीवन -
वेग के आवेग से मैं बच सकूँ -
आंधी औ तूफ़ान से जब-जब घिरुं-
दो अभय वरदान अपराजिता बनू -




जब -जब पा जाता था मन प्रसाद -
विस्मृत हो जाते सारे अवसाद -
आ जाता जीवन में पुनः आह्लाद ,
और फिर जी उठता  प्रमाद ....!!
फिर वही गीत गुनगुनाती रही .........!!
ज़िन्दगी की रीत निभाती रही ..!
कभी धूप कभी छाँव के मौसम से-
निरंतर गुज़रती रही -
उल्लसित जीवन जीने का-
सतत प्रयास करती रही ........!!!
ज़िन्दगी से प्रीत निभाती रही ............!!!!!!

13 May, 2010

नई सुबह -3

  अँधेरे कमरे की
  खिड़की से-
  देख रही थी मैं--
 प्रकृति का करिश्मा....!! ,
 व्योम को निर्निमेष निहारती-
 देख रही थी-
 रात के अंधरे को
  जाते हुए ....
  अरुणिमा को-
पृथ्वी पर आते हुए........!!


भाग रही है पृथ्वी निरंतर 
कुछ पाने को 
क्या पाने को ?
हर पल, पल खोते हुए !!
फिर भी ----
सुबह के आने को
 कौन रोक सकता है ?
सूरज की आभा को
 कौन रोक सकता है ?

बंद हों हृदय के द्वार -
फिर भी ---
सुबह के आने को
 कौन रोक सकता है ?
सूरज की आभा को-
 कौन रोक सकता है ?

सूरज की पहली किरण से
मन की सरिता में
 स्पंदन हो ही जाता है ---!
निष्प्राण निस्तभ्ध शरीर में
 प्राण आ ही जाते हैं .....!!
उठो जागो-
 खोलो मन के द्वार ----
एक नई सुबह ने
घूँघट खोल दिया है-
नई  सुबह का आगमन हो चुका है ......!!!!!!