भोर से पहले ही उठ जातीसूखे सूखे त्रिण चुन लाती
बुलबुल सी उड़-उड़ ...
रे मन चुलबुल ...
बाग़ में चहचहाई है चिड़िया
मन भाई है चिड़िया ..!!
लो ,फिर आई है चिड़िया....
राग विभास की आस .....
चुने हुए शब्द विन्यास ....
सींचती-उलीचती ....
घट भर-भर लायी है चिड़िया ...
सृष्टि पर बिखरा ...
सुरों के रंगों का..तरंगों का ..उमंगों का .
राग लालिल सा लालित्य ..
बुन-बुन गुन लायी है चिड़िया ......
राग के ख्याल में खोयी हुई ...
सुलक्षण सुमंगल परंपरा निभाती ...
दिए की बाती ...
पूजा की थाली में ..
ज्यों जलती जाती .....
पञ्च तत्व..
से पांच सुरों का राग गाती ....
सुध बुध बिसराती..उन्माती ........
माघ के आगमन पर ..
मन के आँगन पर ..
सुघड़ नीड़ पर...
बैठी झूलती .... इतराती ....मुस्काती ...सुस्ताती है चिड़िया ...
अब लो फिर आई है चिड़िया ...!!!!
*विभास और ललित ये दोनों राग सूर्योदय से पहले गए जाने वाले राग हैं ...
*सुरों की उत्पत्ति भी पञ्च तत्वों से ही होती है ...
*राग विभास में पांच स्वरों का प्रयोग होता है...पंचम जाती का राग है ...!!



















