नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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18 January, 2012

लो फिर आई है चिड़िया ........!!

भोर से पहले ही उठ जाती
सूखे सूखे त्रिण चुन लाती
बुलबुल सी उड़-उड़ ...
रे मन चुलबुल ...
बाग़ में चहचहाई  है चिड़िया
मन भाई है चिड़िया ..!!
लो ,फिर आई है चिड़िया....

राग विभास की आस .....
चुने हुए शब्द विन्यास ....
सींचती-उलीचती ....
घट भर-भर लायी है चिड़िया ...

सृष्टि पर बिखरा ...
सुरों के  रंगों का..तरंगों  का ..उमंगों  का   .
राग लालिल सा  लालित्य ..
बुन-बुन गुन लायी है चिड़िया ......
राग के ख्याल में खोयी  हुई ...
कुछ जागी सी कुछ सोई हुई ...
सुलक्षण  सुमंगल परंपरा निभाती ...
दिए की बाती ...
पूजा की थाली में ..
ज्यों  जलती जाती .....
पञ्च तत्व..
से पांच सुरों का राग गाती  ....
सुध बुध बिसराती..उन्माती ........
माघ के आगमन पर ..
मन के आँगन पर ..
सुघड़ नीड़ पर...
बैठी  झूलती .... इतराती ....मुस्काती ...सुस्ताती है चिड़िया  ...
अब लो फिर आई है चिड़िया ...!!!!


*विभास और ललित ये दोनों राग सूर्योदय से पहले गए जाने वाले राग हैं ...
*सुरों की उत्पत्ति भी पञ्च तत्वों से ही होती है ...
*राग  विभास  में  पांच स्वरों का प्रयोग होता है...पंचम जाती का राग है ...!!

10 January, 2012

क्षितिज की तरह ...बहुत दूर हो गयी हूँ मैं ......!

आज सोच में डूबी ..
सोचती हूँ ..क्या हूँ  मैं ...?
जो मैं हूँ वो हूँ ....या ...?
तुम्हारी सोच हूँ मैं ....?

हाँ ... तुम्हारी सोच ही तो  हूँ .......
जब खुश हो तुम...
नीले आसमान पर ..
खूबसूरत रंगों की तरह ...
हंसती मुस्काती ...
तुम्हारे सुंदर भावों की तरह ...
कितनी सुंदर दिखतीं हूँ मैं ...
अपने भाव देखते हो तुम मुझमे ..

क्षितिज ....!!
क्षितिज की तरह.........
हवा सी बहती हुई  ... ....
मन को ख़ुशी देती हुई ... ...

जब जीने लगते हैं..
मुझमे तुम्हारे विचार ..
और  नहीं  चल  पाती  मैं -
 तुम्हारे  अनुसार ......



तब बदल जाते  हो  तुम ..
आसमान पर
बदले हुए रंगों की तरह ...
तस्वीर बदल जाती है मेरी,
तुम्हारे मन में  भी ......
तुम्हारी सोच की तरह बदली  हुई ....!!

अपनी सोच के सांचे में..
अपने मन के ढांचे में ढाला है तुमने मुझे ...
हाँ यथार्थ नहीं ..
तुम्हारी बदली हुई सोच
हो गयी  हूँ मैं अब ....!!
यथार्त में तो ..
मैं जैसी कल थी ...
वैसी ही आज भी हूँ ...
मैं नहीं बदली ...
अब  सोच बदल गयी है तुम्हारी....
इसीलिए ...
अब दृष्टि भी बदल गयी है तुम्हारी ..
तभी  तो  मैं हूँ दूर ...
तुम  से दूर ...!!

अभी भी ..
क्षितिज  की तरह ही ...
हवा सी बहती हुई ...
बहुत दूर हो गयी हूँ मैं ......

01 January, 2012

रस की छाई नील बहार .! ऐसा शुभ प्रभात आया .!.

अहा नील प्रात ....!!
आज शुभ प्रभात  ...आया ..
नव वर्ष नवल नील रस लाया ....
रोम-रोम कैसा हुलसाया   ...
जब  जागा  मन  ...
अब लागा  मन ..!
नील रस भर-भर लाया ...
आज  शुभ प्रभात आया ...!!

जागृत हुई आस ..
प्रभु ..आज तुम आस-पास ...
दिखते हो हर दृश्य में ..
बसते हो मेरे भीतर भी ....
जागृत चेतना में ...!!
मेरी भावनाओं में ...!!
देख सकती हूँ मैं तुम्हे ...
अपने समक्ष ..
अपने चहुँ ओर ..
प्रशांत ..प्रखर ....प्रत्यक्ष
सुदूर प्रचार  प्रसार ..में ..


दिव्य अनुभूति देते  हुए  ...
ऐसे  दिव्य दर्शन में .....
सुलभ कराते हुए
अलभ्य  प्रतिभा में .. ..!


जब नील अम्बर पर ..
उड़ते पंछी ..
झूम  कर ...गाते जयजयवंती ......
पोर-पोर ,भीग-भीग बरसे ..
 नील सुर धार धरा पर ..!!
रास रचें ....रसना ..!!
मन रमे ..रचें ..मन ..रचना ..!!
डूबकर ले  .. लेकर ..
नूतन नील रस धार ..!!


नील ..श्याम  वर्ण हुआ  मन ...!!
नीलिमा की ...
कुसुम की ..
रस की ....
आई ,छाई नील नील बहार  ...!!

आज एक रंग में ..
रंगा सृजन है ....
अचरज से भरा ...
घिरा ..ये मन है ...!!

कैसे उड़-उड़ कर पाखी ...
आसमान में ..
ले-लेकर ..
नील व्योम रंगधारा..
चहके चातक का सुर .. रिषभ...
और ..बहे  पाखी सुरधारा..
गुनती  जाती भावधारा ..
अभिव्यक्त  करती  जीवनधारा ..
किलक हो ... बजता मन इकतारा ....


जब रस की छाई ऐसी ..
नूतन नील-नील  बहार ..
 मगन मन प्रभु मे लागा ......
 मन लागा ..
प्रभु कृपा से ..नील वर्ण चंद्रमुखी ...!!
अब जागा मेरा मन जागा ...!!

आज राग विभास   गुन -गुन गाया ...
ऐसा  .. शुभ प्रात ...आया ..!!


*चातक पक्षी का सुर रिषब(रे) होता है ..!
*जयजयवंती  -एक राग का नाम है .
*विभास-राग का नाम है .


बृहद अरण्यक उपनिषद् से ...

''ॐ असतो मा सद्गमय 
तमसो मा ज्योतिर्गमय 
मृत्योर्मा अमृतं गमय ......!!''


प्रभु से यही प्रार्थना करते हुए ..
आप सभी को नव वर्ष ''2012'' की ढेरों शुभकामनायें...!!

24 September, 2011

सूरज साथ है मेरे .....!!

उड़ान ...!!
 कहते हैं अब रात हो गयी ...
अन्धकार छा गया ...
किन्तु रात के  इस अन्धकार में भी ...
मेरी  यात्रा  तो  जारी  है...
मैं पंछी बन उड़ चली हूँ ....
दूर देस.....
पूनम के चाँद को खिलते हुए ...
देख रही  हूँ .... सोच रही हूँ .... 

दिव्य ऊष्मा  का  दिव्य  रूप ...
सूरज  साथ  है  मेरे ...
पहुँचाता है किरणे अपनी मुझ तक....
तुम साथ हो मेरे .....!!
रात्रि के सर्वत्र व्याप्त तम   में  भी  ....
जैसे  रूप  बदल कर  ...!

इस चांदनी में ...
महसूस होता  है मुझे ....
स्निग्ध   सा..
बरसता ...मुझ  पर ...
शांत  ...शीतल  ...निर्विकार......
मन के पोर-पोर तक रिसता हुआ ...
अपार  ठंडक  देता   हुआ  ...
सूरज  साथ  है  मेरे ....!!!!!

10 September, 2011

पद्मजया ... ही ...बनूँ.......!!

पद्मकली
प्रभु प्रदत्त ...
लालित्य से भरा ये रूप....
बंद कली में मन ईश स्वरुप... 
खुलतीं हैं  धीरे-धीरे ..
मन की बंद परतें...
जैसे पद्मश्री की पंखुड़ी ...
बिखेरतीं हैं इस जग में ...
अरुण कमल .
अपने होने की शुभ आभ ...!!
 और  देती  है  शुभ-लाभ ...!!
या  बिखेरता है ..
लालिमा अरुणाभ ..
जग  आलोकित  करता  हुआ... 
मन प्रकाशित करता हुआ...!!

लेतीं हूँ तुम से  प्रेरणा  पद्मकली....
खुलती  जाएँ ज्यों -ज्यों ...
मेरे मन की परतें ....
हे  पद्मा  .. पद्मश्री ...
मैं  पद्मप्रिया  ...
तुम्हें पाकर....तुम्हें निहारकर ...
तुम्हें स्पर्श कर ...
पद्मजया ....पद्मजया ... ही ...बनूँ.......!!

                                                         संगीत के विषय में जानना चाहें  तो पधारें यहाँ ......सुरों  का  तसव्वुर ...
                                                                      swaroj sur mandir (स्वरोज  सुर  मंदिर )

Lotuses are symbols of purity  and hence symbolize divine birth. 
According to the Lalitavistara, 'the spirit of the best of men is spotless, like the new lotus in the [muddy] water which does not adhere to it', and, according to esoteric Buddhism, the heart of the beings is like an unopened lotus: when the virtues of the Buddha develop therein the lotus blossoms.

10 August, 2011

ये कौन शिल्पकार है ...?


विहंगम मधुरिम..
दृश्य धरा का ....
अविरल पड़ती बूंदे मूसलाधार ...!!
धरा  का  ये  मनोहारी  रूप ....!!
फिर भी उड़ते विहग...
साधक सुर साधें राग-विहाग....!


वर्षा की रिमझिम से दूर ...
धुन में अपनी ही ..अलमस्त...
चित्र में रंग भरता था ..
 एक चित्रकार..!!
चलता था जीवन...
अज्रस  ..अविरल ..अनवरत ..लगातार ...!!
एक शिल्पकार के लिए ...
गतिमान  जीवन की ..
फिर भी वही रफ़्तार..........!!


रे मन..
लागी रे  ये कैसी लगन....
चलता है ..चलता है....  
न  थमता है ...
न थकता  है  ..!

दूर दिखते शैल-पर्ण 
आच्छादित ..मेघ श्याम वर्ण  ....
घटा बरसती है घनघोर..
घटा बरसती घनघोर ...!!!
प्रेम  बरसाती  सराबोर..... 
कुछ इस तरह ...
जैसे कहती हो ..
हे सृजनहार ...
अबकी न मानू हार ...
रूम-झूम...
बरस जाऊं ऐसे के ..
प्यासा ना रह जाये कोई ...!!

वैविद्ध्य से रचा-बसा...
जीवन का सुंदर मेला ..
कृपानिधान कृपा करो ऐसी ..
कि रहे न कोई भी अकेला ...
शिल्पकार गढ़ रहा है..
ये कैसा अद्भुत शिल्प...
अरे देखो ..भीगती बारिश में भी ...
ये कौन वृद्ध ...सर पर छतरी लिए ..
बालक को ...
जीवन मार्ग दिखा रहे हैं ...
दूर से आती हुई बस तक ..
विद्यालय छोड़ने जा रहे हैं ..
अपने गंतव्य तक पहुंचा रहे हैं ...!!
अपार..अनंत नयनसुख ..
भर नयनो में ..
विहंगम मधुरिम दृश्य देख ...
मन स्वयं से पूछ रहा है ..
जीवन लड़ियों को..
कड़ियों सा जोड़ता हुआ ..
और ..मेरी ही सोच को..
मुझसे आगे-आगे राह दिखाता हुआ ...
ये कैसा सृजनहार है ...!!
ये कौन शिल्पकार है ...?


06 August, 2011

फिर रीत सा क्यूँ जाता है मन ...?

आज वर्षा  के संग 
Painting by Pragya Singh.
स्मृतियों का रंग मिला है ...
बेरंग पानी में घुल-मिल गयीं हैं .स्मृतियाँ ...
हिल-मिल जैसे स्मृतियों की वर्षा है ... ..
एक सावन की धारा..
मन में जो बहती है ...
दूर रह कर भी हमें....
आस-पास कर देती है .. 
साथ बीते हुए लम्हों का..
यादों की बरसात ले ..
ये रंग जो बरसता है ..
सावन की फुहार है ...
भीगता मन बार-बार  है ..
भीग गया है तन-मन इस तरह ...
घुल-मिल ....
इसी बेरंग पानी में..
अब मिल गया है..
मेरे आंसुओं का रंग भी ...!!
आज ये बेरंग पानी के संग कैसी वर्षा है ...?
कुछ रंग देती है भिगा कर मुझे ..अनायास ..  ..!!
और अंसुअन संग धो देती है ...
वही खिले-खिले रंग ...!!
बह रही हैं रंगीन स्मृतियाँ जैसे ....
मन स्मृतियों में भी ..ढूँढता  है ...तुम्हें ....!!
तुम्हारे बिन घुल से जाते हैं ये रंग...!!
धुंधला सा पड़ता ये चित्र जीवन... 
फिर रीत सा क्यूँ जाता है मन ...?

कुछ यहाँ परिकल्पना पर भी पढ़ें....
आभार....

01 August, 2011

देखो ..देखो मतवारी वर्षा....!!


धन घड़ी आई...पिया के आवन की पतियाँ लायी ....!!

अपनी सभ्यता और संस्कृति से  जुड़े ,हम जैसे लोगों के लिए तीज का त्यौहार अपार हर्ष, आनंद ,उत्साह लेकर आता है ...!!शुभ सन्देश..शुभ घड़ी लाता है ...!!
कल २-अगस्त को हरियाली तीज है ... आप सभी को हरियाली -तीज की अनेक अग्रिम .. शुभकामनाएं ..!!सपरिवार सहर्ष हरियाली तीज मनाएं ...घेवर खाएं ..!!
आज फिर एक खुशनुमा रचना है वर्षा पर.......


कड़-कड़  कड़कडाती...
मृदंग सा बजाती....
दूर से आ रही है ..उड़ के आ रही है ..
बिजुरी देती दस्तक..!!
दूर से आ रही है ..
उड़ के आ रही है ..
सन न  न साँय-साँय डोले ...
मनवा के भेद खोले ..
पवन संग ..
देखो ..देखो ....
झम-झम झमझमाती मतवारी वर्षा....!!
..............!!!
मुझे ..तुम्हें   भिगाने ...
नृत्य करने लगा है मन ....
 छुपा हुआ बचपन....
गोल-गोल घूमता ..
 भींजता  तन-मन...
...जाने-अनजाने ...!!
झूम कर मल्हार ..लगा है गाने ...!!

घड़-घड़  घड़ घडाते ...
चहुँ दिस छाये ..
कृष्णा से नीले अम्बर से ..
बरसे ऐसी धार
धरा पर ..
Painting by Pragya Singh.
हरियाली राधा मन भाये ..
अधरों पर मुस्कान जगाये ..
रिमझिम पड़ रही प्रेम फुहार ...
सजनवा अमुवा पे  झूला दो डार ...
तीज को आयो है त्यौहार...


मोरा जिया गया हार .
मगन अब ....
झूला-झूले ...
सावन के गीत गाये  ..
धन्य री मतवारी वर्षा ...
ये कैसा ...
अनुराग जगाये ...
चहुँ दिस ..बरस ..बरस ...
अमिय रस  बरसाए .. ..!!


25 June, 2011

वसुधैव कुटुम्बकम.......!!

मन सोच सोच अकुलाये...
कई बार समझ न आये ...
क्या मैं भी बन जाऊं -
व्यापक  व्यवस्था का वो हिस्सा ...
बन  जाऊं दलदल ..कीचड़ में ... 
और सुस्ताऊं जीवन भर .... !!

या संकल्प  लूँ मन ही मन में  ..
खिलना कमल को है कीचड़ में .. 
तब तो सहेजना  होगी ...
कंपकपाती वो ज्योत मन की ..
कभी  कभी  बुझने  सी  लगाती  है  जो - 
थामने होंगे संघर्ष   के  बोझ  से दबे .. ..
 अपने ही लड़खड़ाते हुए कदम ...
वो उर्जा ..समेटनी होगी ...
सिक्त करना होगा ..रिक्त ह्रदय ....
अपनाना होगा मनुष्य को -
मनुष्य भेस में ही ...
संचार करना ही होगा मन में ...
दिव्य ऊष्मा का ..
स्वयं और स्वजनों के लिए भी ..
तब ही  हम सब उस शुभ विचार का  -
प्रसार ..प्रचार करते हुए -
इसी धरा पर सब  मिल  कहेंगे ...
वसुधैव कुटुम्बकम.......!!
वसुधैव कुटुम्बकम.......!!