जीवन की गहराईयों में
डूबने लगा जब मन ...
टूटने क्यों लगे ...
नयनो के प्यारे सपन ...
जैसे तेज़ धूप से
कुम्हलाने लगा हो ...
कोमल पुष्प का तन ...!!
करती हूँ जतन..
बंद कर लूं नयन ...
ढलकने न दूं उन्हें ...
जीते हुए जीवन से मिले थे जो ...
सहिष्णुता से ..सुन्दरता से ...
ओस से कोमल एहसास तुमसे .. .......
तुम ही तुम ....
तुम्हारे ही रूप ,लावण्य से परिपूर्ण ...!!
किन्तु सोचती हूँ ...
अब डर क्यों लगता है ...?
डर भी ये जीवन का
सत्य ही तो देता है ...!!
बुद्धि ,विवेक जब साथ देता है मेरा ...
यकायक ..बुद्धि मुखर हो उठती है ...कहती है ...
''सिर्फ कोमलता ही तो जीवन नहीं ...
जीवन का साथ निभाना है तो ...
कठोरता भी सहना ही पड़ती है ...
सुख ही सुख की चाहत रखना ...
दुःख से मुहं मोड़ लेना ...
जीवन से भागना तो पलायन ही है ....!! ''
रखती हूँ मान मन का ...
हंसकर सुनती हूँ बात मन की ...
धरती हूँ और धीरज ...
किन्तु ....अब ...धैर्य की परीक्षा देते देते .....

शिथिल हो रही हूँ .....
मांगती हूँ थोड़ा और धैर्य ...
प्रभु से ......
कि ये आसक्ति ...
बनी रहे जीवन से .....!!
धूप में खड़े-खड़े ..
आज डरती हूँ ...
ये बूँदें सहेजूँ कैसे ...?
कहीं ढलक कर ...
मेरे नयनो से ..
ये ओस से ..पावस ..गहरे ...अमिय ..
अनमोल एहसास..
यूँ स्वयं गिरकर .........
और गिराकर तुम्हारी छवि मेरे नयनो से ...
मुझे विरक्त ही न कर दें ...!