नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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19 July, 2021

प्रेम तब भी जीवित होगा


मैं शब्द हूँ

नाद ब्रह्म ...

प्रकृति में रचा बसा ...!!

हूँ तो भाव भी हैं

किन्तु ,

मौन रहूँगा तब भी


भावों का अभाव न होगा !!

प्रतिध्वनित होती रहेगी

गूंज  मेरी , अनहद में 

उस हद से परे भी

प्रकृति की नाद में ,

जल की कल कल में

वायु के वेग में

अग्नि की लौ में  ,

धृति  के धैर्य में,रंग में ,बसंत में,

और आकाश के विस्तार में

पहुंचेगी मेरी सदा तुम तक !

प्रभास तब भी जीवित होगा !!

 प्रेम तब भी जीवित होगा ...!!!


अनुपमा त्रिपाठी 

''सुकृति ''



24 July, 2015

भोर हो गई ...!!

रात्रि के नीरव एकांत में ,
चाँद रौशन हुआ ,
मन का जब दीप जला,
पथ प्रदर्शित हुआ !!
मन चिन्मयानन्द  हुआ   …!!
बहती हवाओं में ,
फिर मेरा मैं चलता ही रहा ,
वो दीप जलता ही रहा …!!

माँ की दुआओं से ,
मन के अडिग विश्वास से ,
सदाओं का तेल भरता ही गया ,
 असर ऐसा रहा ,
वो दीप जलता ही रहा
मेरा मैं
अपनी राह चलता ही रहा    …
और …
और भोर हो गई ...!!

29 April, 2012

खिला-खिला खुला -खुला है आसमान ...!

स्मित ....सलोनी सी मुस्कान ...
विलुप्त हो गयी ....
..रे मन .....
आज गुम सा ...
डूबा डूबा सा क्यूँ है ...?
संकुचित ,कहाँ दबी है ...
नारंगी सी  ...
वो सहज मुस्कान भीतर ....?

सिमटा-सिमटा सा ...
क्यूँ संकीर्ण हो गया है ...?
तेरे जाते ही नारंगी रंग भी -
स्याह हो गया है .....!!
प्रकाश कहीं खो गया है ...!!

इस अँधेरे में ...
अब तू क्या टटोल रहा है ....?
अपने मन में ही ढूंढ मुझे ....
मैं ही तेरी खिली सी मुस्कान हूँ .....
बस कुछ पल को सिमट गई हूँ ....
पर तुझसे दूर नहीं हूँ ...!!

मुझे ही ढूंढ रहा है न ....?
थाम  ले मुझे और निकल आ ...
इस अंधियारे से .....
 बिखर जा .....
चहुँ दिस ... चहुँ  ओर ......
मैं तो जानती हूँ .....
हैं  फिर  भी  कुछ  सुराख ...
जहाँ से ... 
बातों ही बातों में ....
ये अँधियारा निकल जायेगा ....
सहमी-सहमी सी ये रात ...
ये रात बीत जाएगी ...
और ...
तुझसे बात करते करते....
मेरी कविता भी ...
खिल -खिल जाएगी ....
जब निकल जायेंगे -
 मन के उदगार .......
विकीर्ण हो ,निकल आएगा -
सूरज भी उस पार .........
अब देख ....देख तो ......
रहा नहीं कोई अंदेशा ....
प्रभु ने भेजा है संदेशा  .....
अहीर भैरव सी ...आनंदमयी  भोर भई .......
फिर भर ले मन की  उड़ान .......
उज्जवल ...खिला-खिला खुला -खुला है आसमान ...!

 *अहीर भैरव  प्रातः का संधिप्रकाश राग है ...!

12 April, 2012

ओस से कोमल एहसास ...

जीवन की गहराईयों में
डूबने लगा जब मन ...
टूटने क्यों लगे ...
नयनो के  प्यारे सपन ...
जैसे  तेज़  धूप से
कुम्हलाने  लगा  हो ...
कोमल पुष्प का  तन ...!!

करती हूँ जतन..
बंद कर लूं नयन  ...
ढलकने न दूं उन्हें ...
जीते हुए जीवन से  मिले थे जो ...
सहिष्णुता से ..सुन्दरता से ...
ओस से कोमल  एहसास  तुमसे .. .......
तुम ही तुम ....
तुम्हारे ही रूप ,लावण्य से परिपूर्ण ...!!

किन्तु सोचती हूँ ...
अब डर क्यों लगता है ...?
डर भी ये जीवन का
सत्य ही तो देता है ...!!

बुद्धि ,विवेक जब साथ देता है मेरा ...
यकायक ..बुद्धि मुखर  हो उठती है ...कहती है ...
''सिर्फ कोमलता ही तो जीवन नहीं ...
जीवन का साथ निभाना है तो ...
कठोरता भी सहना ही पड़ती है ...
सुख ही सुख की चाहत रखना ...
दुःख से मुहं मोड़ लेना ...
जीवन से भागना तो पलायन ही है ....!! ''

रखती हूँ मान मन का ...
हंसकर सुनती हूँ  बात मन की ...
धरती हूँ और धीरज ...
किन्तु ....अब ...धैर्य  की परीक्षा देते देते .....
शिथिल हो रही हूँ  .....
मांगती हूँ थोड़ा और धैर्य ...
प्रभु  से ......
कि ये आसक्ति ...
बनी रहे जीवन से .....!!
धूप में खड़े-खड़े ..
आज डरती हूँ ...
ये बूँदें  सहेजूँ कैसे ...?
कहीं ढलक कर  ...
मेरे नयनो से ..
ये ओस से ..पावस ..गहरे ...अमिय ..
अनमोल एहसास..
यूँ स्वयं  गिरकर .........
और गिराकर तुम्हारी छवि मेरे नयनो से ...
मुझे विरक्त ही न कर दें ...!


07 March, 2012

तुमरी राधा रह जाऊं .. .....!!!!



सील संतोस से
चन्दन  घोर घोर ...
केसर रंग पोर पोर ......
हियरा में उठत हिलोर ....
प्रेम प्रीत पिचकार बनाई..
होरी आई सब रंग ,रंग लाई  ...
श्याम तुम रंगे सब रंग ...
मैं कैसे खेलूं होरी श्याम के संग ...
रंगूँ तुम्हें अब किस विध  अपने रंग ...?
होरी कैसे खेलूं श्याम के संग ...?
आज मैं ही रंग जाऊं श्याम के प्रेम रंग ...!!

तुम से  लिप्त ...
तुम में  लिप्त ...
ऐसी खो जाऊं ...
तुम रक्षक प्रभु मेरे ...
बांस की बाँसुरिया नेक  बजाऊं ......
तुमरी तान मगन जब गाऊं ...
सुध-बुध  बिसराऊं  ...
प्रेम राग, भर अनुराग ,फाग सुनाऊं ......
आज मान दो इतना ...
युगों-युगों तक ...
मैं ही बस ..
तुमरी  राधा रह जाऊं .. .....!!!!

10 January, 2012

क्षितिज की तरह ...बहुत दूर हो गयी हूँ मैं ......!

आज सोच में डूबी ..
सोचती हूँ ..क्या हूँ  मैं ...?
जो मैं हूँ वो हूँ ....या ...?
तुम्हारी सोच हूँ मैं ....?

हाँ ... तुम्हारी सोच ही तो  हूँ .......
जब खुश हो तुम...
नीले आसमान पर ..
खूबसूरत रंगों की तरह ...
हंसती मुस्काती ...
तुम्हारे सुंदर भावों की तरह ...
कितनी सुंदर दिखतीं हूँ मैं ...
अपने भाव देखते हो तुम मुझमे ..

क्षितिज ....!!
क्षितिज की तरह.........
हवा सी बहती हुई  ... ....
मन को ख़ुशी देती हुई ... ...

जब जीने लगते हैं..
मुझमे तुम्हारे विचार ..
और  नहीं  चल  पाती  मैं -
 तुम्हारे  अनुसार ......



तब बदल जाते  हो  तुम ..
आसमान पर
बदले हुए रंगों की तरह ...
तस्वीर बदल जाती है मेरी,
तुम्हारे मन में  भी ......
तुम्हारी सोच की तरह बदली  हुई ....!!

अपनी सोच के सांचे में..
अपने मन के ढांचे में ढाला है तुमने मुझे ...
हाँ यथार्थ नहीं ..
तुम्हारी बदली हुई सोच
हो गयी  हूँ मैं अब ....!!
यथार्त में तो ..
मैं जैसी कल थी ...
वैसी ही आज भी हूँ ...
मैं नहीं बदली ...
अब  सोच बदल गयी है तुम्हारी....
इसीलिए ...
अब दृष्टि भी बदल गयी है तुम्हारी ..
तभी  तो  मैं हूँ दूर ...
तुम  से दूर ...!!

अभी भी ..
क्षितिज  की तरह ही ...
हवा सी बहती हुई ...
बहुत दूर हो गयी हूँ मैं ......

01 January, 2012

रस की छाई नील बहार .! ऐसा शुभ प्रभात आया .!.

अहा नील प्रात ....!!
आज शुभ प्रभात  ...आया ..
नव वर्ष नवल नील रस लाया ....
रोम-रोम कैसा हुलसाया   ...
जब  जागा  मन  ...
अब लागा  मन ..!
नील रस भर-भर लाया ...
आज  शुभ प्रभात आया ...!!

जागृत हुई आस ..
प्रभु ..आज तुम आस-पास ...
दिखते हो हर दृश्य में ..
बसते हो मेरे भीतर भी ....
जागृत चेतना में ...!!
मेरी भावनाओं में ...!!
देख सकती हूँ मैं तुम्हे ...
अपने समक्ष ..
अपने चहुँ ओर ..
प्रशांत ..प्रखर ....प्रत्यक्ष
सुदूर प्रचार  प्रसार ..में ..


दिव्य अनुभूति देते  हुए  ...
ऐसे  दिव्य दर्शन में .....
सुलभ कराते हुए
अलभ्य  प्रतिभा में .. ..!


जब नील अम्बर पर ..
उड़ते पंछी ..
झूम  कर ...गाते जयजयवंती ......
पोर-पोर ,भीग-भीग बरसे ..
 नील सुर धार धरा पर ..!!
रास रचें ....रसना ..!!
मन रमे ..रचें ..मन ..रचना ..!!
डूबकर ले  .. लेकर ..
नूतन नील रस धार ..!!


नील ..श्याम  वर्ण हुआ  मन ...!!
नीलिमा की ...
कुसुम की ..
रस की ....
आई ,छाई नील नील बहार  ...!!

आज एक रंग में ..
रंगा सृजन है ....
अचरज से भरा ...
घिरा ..ये मन है ...!!

कैसे उड़-उड़ कर पाखी ...
आसमान में ..
ले-लेकर ..
नील व्योम रंगधारा..
चहके चातक का सुर .. रिषभ...
और ..बहे  पाखी सुरधारा..
गुनती  जाती भावधारा ..
अभिव्यक्त  करती  जीवनधारा ..
किलक हो ... बजता मन इकतारा ....


जब रस की छाई ऐसी ..
नूतन नील-नील  बहार ..
 मगन मन प्रभु मे लागा ......
 मन लागा ..
प्रभु कृपा से ..नील वर्ण चंद्रमुखी ...!!
अब जागा मेरा मन जागा ...!!

आज राग विभास   गुन -गुन गाया ...
ऐसा  .. शुभ प्रात ...आया ..!!


*चातक पक्षी का सुर रिषब(रे) होता है ..!
*जयजयवंती  -एक राग का नाम है .
*विभास-राग का नाम है .


बृहद अरण्यक उपनिषद् से ...

''ॐ असतो मा सद्गमय 
तमसो मा ज्योतिर्गमय 
मृत्योर्मा अमृतं गमय ......!!''


प्रभु से यही प्रार्थना करते हुए ..
आप सभी को नव वर्ष ''2012'' की ढेरों शुभकामनायें...!!

27 November, 2011

एक दिन................!!

इस  धरा पर ....
कई साल पहले ...
जन्मी थी एक   दिन  ...

माँ का स्पर्श ..याद है मुझे ...
आया आया ..दही वाला आया ..
सुन सुन कर ...
थाम कर उंगली उनकी ..
खिलखिलाकर ...
चली थी एक  दिन....

माँ ने चलाना ही सिखाया ...
और  कुछ ...
और बहुत कुछ ..पा जाने की इच्छा जब जागी ....
दौड़ना ..मैंने सीख ही  लिया ..
एक दिन..!!

छोटी सी ललक थी ..
बढ़ते बढ़ते ..
अपने अधिपत्य की कामना बनने लगी ......
और  कुछ ...
और बहुत कुछ पा जाने की इच्छा जब जागी ...
 अंधी दौड़ में भागते हुए ...
जग से प्रेम त्याग ..
अपनाया ..द्वेष ..इर्ष्या...छल ..राग ..
 फिर ..कपट  करना..मैंने  सीख ही  लिया ..
 ...एक दिन........!!

भागते भागते इस दौड़ में ..
 दौड़ को जीतने  की लालसा....
जब जागी ......
साम,दाम,दंड भेद ...
झूठ पर भी हो न खेद ...
और ..फिर ...
जग से मुखौटा लगाना भी ...
मैंने सीख ही लिया...
एक दिन....  ..!!

जीतने  लगी  मैं ...
लगते रहे मुखौटे ...
भरते रहे भण्डार ...
सूर्यास्त की बेला हुई .....
छाने  लगा अन्धकार ...
छूट जाने के डर से घिरी हुई  ........
सब छूट जाये पर,
छूटता नहीं मोह अब ...
न सखी न सहेली ....
बैठी हुई ..नितांत अकेली
फिर भी ......
देखो तो पापी मन मेरा  ...!
Painting by Abro khuda bux.
झगड़े और करे मेरा..तेरा  ..!!
डर-डर कर रहना सीख रहीं हूँ अब ...


क्षमा करना प्रभु ...
तुमने दिया था जन्म मुझे ..
खुली खुली इस सुंदर ...
मनमोहक   धरा पर . ..!
किन्तु ..मेरे द्वारा  बसाई ...
इस दुनिया के पिंजरे में क़ैद हो  ...
अपने आप से दूर ........
बहुत दूर  ....
और निरंतर दूर होती हुई ...
पिंजरबद्ध हो..
 रहना...मैंने...सीख ही लिया...
 एक दिन........!

हाँ ...अपनी इस काया के लिए जीना..
मोह में बंधना .. माया के लिए जीना ..
मैंने सीख ही लिया...
 एक दिन ..............!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!