नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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19 December, 2012

प्रस्तार कहाँ से लाऊँ ...

आज फिर चली जा रही हूँ ...
बढ़ी जा रही हूँ .....
आस से संत्रास तक .....
खिँची खिँची ...
नदिया किनारे ....
कुछ यक्ष प्रश्न लिए ...
डूबता हुआ सूरज देखने ....
पंछी लौटते हुए .. ...अपने नीड़....
मेरे हृदय  में भरी जाने क्या पीर ....
कहाँ है  मेरी आँखों में नीर ....??

जवाब नहीं देती ....
दग्ध ....
सुलक्षण बुद्धि भी ..
जैसे कुछ पल ....
आराम करना चाहती है .....!!

धीरे धीरे डूब गया है सूरज .....
भावनाओं का ......
गहन अंधकार से घिरी मैं ...
तम की शैया पर सोचूं ...
पलक कैसे झपकाऊँ ...?
दुस्तर   प्रस्तार कहाँ से लाऊँ ...?
गहन अंधकार को भेद ...
संत्रास कैसे मिटाऊँ ....??

जीवन ज्योति किस विध पाउँ ..?
धीर धरूं ...धैर्य कि माला जपूँ..
गहन आराधन समय बिताऊँ ...
जो होगा  प्रार्थना में दम ....
समय के साथ ...
मिट ही जायेगा .... ये तम.... !!
आस मैं मिटने नहीं दूँगी ....
संत्रास मैं रहने नहीं दूँगी .

होगी ही ...फिर होगी भोर ....
संस्कृति ...सभ्यता पर छाया घना कोहरा छंट जाएगा ...
विवेक    हृदय   द्वार  खटखटाएगा .....
यदा यदा ही धरमस्य ग्लानिर्भवति भारत .....
जन जन मानस मे कृष्ण बन ...
आएगा आयेगा पुनः ....
 सवेरा ज़रूर आयेगा .....!!

13 July, 2012

निकला है चाँद......!!

पूनम का निकला  है चाँद...
थम गई है रात ...
चांद को निर्निमेष निहार ...
भीग रही है रात ....

लहरों सी लहरें ...
मन मे उठती हैं ......
तरंगों सी उमंगें ....
सींचती है रात ....

ये कैसा सन्नाटा  है ...
के गाती है प्रीत ...
ख़्वाहिशों  का दामन ..
भिगोती है रात ....!!


कल कल बहता नदिया का जल ..
तिस पर गिरती ...टिपिर टिपिर ...
बूंदों की ये आवाज़ ....
जैसे बज रहा हो  कोई साज़ .....!!

मूंद कर पलकों को...
चांद भर  नयनों मे ..
भीगी भीगी सी ..
प्रीत भर लेती है रात ....!!

स्निग्ध चांदनी में डूबी ...
भीनी  चंदरिया ओढ़े ...
कैसी खिलती है रात ..
कैसी भीगती है रात ...!!

11 July, 2012

मचल रही बूंदरी ...!!!!!!


सना नना...
सना नना सायँ सायँ   ....
पुरवा  करत अठखेली  ...
 उड़ाए ले रही सर से चूनरी ...!!

चम-चम चमक चमक.....
चमके ......मन कामिनी...
दम-दम दमक दमक ....
दमके   दुति दामिनी ....
री सखी ...रूम-झूम ...
लूम-झूम ..झूम-झूम ..
घन घन बरस रही बूंदरी ...!!

झम-झम ...झमाझम .....
मूसलादार  पड़ रही वृष्टी...
भीग रही  ....तर बतर अतर  ... समग्र सृष्टी..
सखियाँ खिल-खिल भींजत जायें....!!
हंस-हंस घूम-घूम फुगड़ी खेलें....
पटली जड़ाऊ नगदार ...
पहने इठलायें...!!
हाय सखी ऐसे मे....
श्याम  मोसे रूठ रूठ  जाएँ ...!!
अमुवा झूरा ना झुरायें...
सखी कैसे करूँ मनुहार ....??
काह करूँ..कित जाऊँ..??
मन बतियाँ कह नाहिं पाऊँ ....
बोलन बिन चैन नाहिं पाऊँ .......!!
कैसे मनाऊँ ....??

आली ....घन घन घना घन..
 श्याम  घन  बरस रही बूंदरी .....
जियरा मोरा भिगोय रही ...
चंचल श्याम सी ...
मन अभिराम सी ...
हाय री नादान ....
कैसी मचल रही बूंदरी ...!!!!!!

25 June, 2012

हवन का ...प्रयोजन.....!!

मिट्टी के हवन कुंड में....
समिधा एकत्रित ...
की अग्नि प्रज्ज्वलित ....
ॐ का उच्चारण किया ...
अग्निदेव को समर्पित ...
हवि की  आहुती ...
किया काष्ठ की स्रुवा से ...
शुद्ध घी अर्पण ...
मन प्रसन्न ....
धू धू जल उठी अग्नि ...
अहा ...प्रसन्न हुए अग्निदेव ....!!
 
हवन किया ....
हाँ निश्चय  ही ....
प्रायोजित हवन किया ....!!
किंतु फिर भी ...
प्रयोजन तो जाना नहीं-
हवन का ....!!

निष्ठुर  मन ..
निष्ठा ना जाने ...
क्या था प्रयोजन...
ये भी ना माने ...!!
ॐ कहते कहते ध्यान करें .. अहम .....
अब अहम से हम ...
अहम से हटा कर "अ"
अ यानि  अहंकार को ...
अब बनायें 'हम' ....
इस प्रज्ज्वलित अग्नि मे ....
ॐ  कहते कहते ...
चलो करें...
अपने-अपने ....
अहंकार का दाह संस्कार  हम ...!!

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*समिधा -हवन मे इस्तेमाल की जाने वली सूखी लकड़ी  
*हवि-हवन सामग्री
*काष्ठ -लकड़ी
*स्रुवा -वह चम्मच-नुमा बर्तन जिसमें (घी इत्यादि) हवन-सामग्री भरकर हवन-कुंड में आहुति दी जाती है.


19 June, 2012

हर प्रात ...कहते हुए ...शुभप्रभात ...!!

इस घने विपिन मे ...
स्मित ...स्वर्णिम विहान सी ...
शुभप्रभात सी ...
एक आकृति ...
सप्त  स्वर ...
नवल-रस परिपूर्ण  कुंभ सी ...
भर-भर ..छलकाती ...
उड़ेलती मधु-रस ...
जीवन सरस..
प्रभास सी ..
आपकी आभा हम पर ..
हम वृक्षों पर ...
बरसती रहे ...
किरणों की सरिता
 सुरमई ......अनुरागमई ...प्रवाहमई .....
यूं ही बहती रहे ....बहती रहे ...बहती रहे .....!!
हर प्रात ...
अलंकृत... विभूषित  करती हुई ......
कहते हुए ...
शुभप्रभात ...हे प्रभु ....!!


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विपिन-जंगल
स्मित-मुस्कान
विहान-सुबह

13 May, 2012

ये जीवन की अनगिन कहानी गहूँ मैं ...!!

13thMay ..माँ आसपास ही हैं आज ....!
१३ मई....:)  खुश होने की बहुत सारी  वजह हैं आज .......!
*मदर्स डे
*गुरु जी ,श्री श्री जी ,का जन्मदिन
*एक और है जो आप पोस्ट पढ़ कर अंदाज़ा लगा लेंगे ....!


........आज सोच रही हूँ ,समय किस रफ़्तार से भागता है ..?
जितना गुजार गया अब उतना तो बाकी नहीं है |जो भी जीवन दिया माँ  ,तुमने  ......भरपूर जिया है अभी तक ....!विभिन्न घट जीवन के ,सुख के ...दुःख के ...हँसी के ..आंसू के ......भर रही हूँ  ...धीरे धीरे ...!
बस ....कृतज्ञ हूँ ...!!
सच कहूँ तो ....मन तो बच्चा ही है अभी  भी ...!अभी  तो बहुत कुछ करना है .....अभी तो बहुत दूर जाना है ............जीना है जीवन भरपूर ...स्वयं और स्वजनों के लिए भी ..........अगला जन्म लेने से पहले .....अलंकृत करना है ...... नेह से स्वयं को और स्वजनों को भी ......तुम्हारी तरह बनना है माँ ...!!इसलिए प्रभु से हर पल प्रार्थना करती हूँ ...उजला कर देना , प्रभु मन ....यही कामना है ...!ताकि तुम्हारे पास आऊँ तो तुम्हें शिकायत का मौका न मिले ....!!


                                      **************************************************

                                       ये जीवन की अनगिन कहानी गहूँ मैं ...!!

स्वर की कल्पनातीत  उड़ान .....
एक आशातीत  मुस्कान ...
यही है   जीवन  ..!

 इक पल , इक बूँद सी बन ...
देती स्पंदन .....!
या सूरज की स्नेहिल  किरण ....
 बनी नारंगी रंग ...
रंगे   जीवन ....
रंगे   तन-मन ....!!

कभी मन जो डोले ..
हवा सी उडूँ मैं ......!!

कभी मन जो उमड़े ...
घटा सी घिरूँ मैं ...
बरसती झमाझम ..
कभी मन जो बोले ...!!
ये भेद जिया के ...
यूँ हंस-हंस के खोले ...!!


मरू में बनाऊं..
मैं अपना ठिकाना ...
तरू में समाऊँ ...
मैं दूं आशियाना ...
है आकाश मेरा ..
मैं उन्मुक्त पाखी ...!!
उडूँ यूँ मैं देखूं ..
धरा की ये झांकी ....

ये जीवन बसा है ,
समाया है मुझमे ...
बहूँ बन के नदिया..
 रवानी बनू मैं ...
ये जीवन की अनगिन
कहानी गहूँ मैं ...!


08 May, 2012

अनंत...अंतहीन यात्रा मेरी ........!!

गुलमोहर की छाँव

दूर ..सुदूर पहाड़ी पर ...
मेरा मन मंदिर ...
दिखता है तुम्हारा 
आलीशान  मंदिर .....
चढ़ रही हूँ ....
लीन तुम में ...
एकाग्रचित्त ....!!
सुरों की माला जपती ...
कितने सुंदर रस्ते से -
गुज़र रही हूँ मैं .......!!
राह पर भरे   हुए ..
झरे हुए  गुलमोहर....!!
बन बन भरे हुए लाल-लाल  ...
जलते हुए ..पलाश ...!!


अमलतास के झूले ....मन झूम-झूम झूले ...
झूलते पीले-पीले अमलतास  ........
चमेली की महक से ..
भरता जाता मन ..!!
गुनगुनाता ...
खुशबू  लुटाता ..
सुरों का सम्मोहन ......!!
पराग के अनुराग  से 
लदा -लदा  हरसिंगार ...
हरसिंगार .....प्रभु चरणों में ...
भर-भर  अंजुरी उड़ाती  चलूँ ...
मन  बसंत   बहार ....!!
प्रभु ...तुम हो साथ मेरे ...
और चल रही है ...
अनंत...अंतहीन यात्रा मेरी ....!!




अथक परिश्रम ....
टप टप गिरतीं हैं पसीने की बूँदें ....
कैसा आश्चर्य है ...
जितना चलती हूँ .......
हलकी होती जाती हूँ ...
ऊर्जा बढ़ती जाती है ...
जिजीविषा मुस्काती जाती है ...
उड़ने सी लगती हूँ ....
झूमने सी लगती हूँ ...
खिलता जाता है ...कोमल ..
मन का नील  कमल ...!!
खिलता सरोज .....माँ  जैसा ...!!
प्रभु ...तुम हो साथ मेरे ...
और चल रही है ...
अनंत..अंतहीन यात्रा मेरी ....!!


इस अनुनेह में ....
अनुपम  अनुभूति है ....
शंख नाद सी ...
अनुगूंज उस अनुनाद की ..
सतत ही  वो नाद सुनना ....!
मेरा मन  भी गूंजता है ...
तानपुरे की उसी नाद से ....!
नित-नित मेरा ह्रदय झंकृत करता हुआ ...!!
सुर अलंकृत करता हुआ ....!!
प्रभु ...तुम हो साथ मेरे और ...
चल रही है ...
अनंत...अंतहीन यात्रा मेरी .....!!


जीवन  की इस धूप-छाँव में ...
जीवन में धूप भी..छाँव भी ....
अनेक रूप में ,
मंदिर की घंटी,
चर्च की चाइम या,
मस्जिद  की अजान हो-
आँख बंद करके जब सुनती हूँ,
सुरों में छुपे सेदिखतेहो..
प्रभु हर पल मेरे साथ ,ब्रह्म स्वरुप -नाद में,
अनेकों रागों के प्रारूप में,
स्तब्ध हूँ ...चाहे चंद्रकौंस हो  ...या गोरख कल्याण,तृप्त कर देते हो मुझे ....
प्रभु ...तुम हो साथ मेरे और ...चल रही है ..अनंत...अंतहीन यात्रा मेरी .....!!




*चंन्द्रकौंस और गोरख कल्याण -रागों के नाम हैं ....

29 April, 2012

खिला-खिला खुला -खुला है आसमान ...!

स्मित ....सलोनी सी मुस्कान ...
विलुप्त हो गयी ....
..रे मन .....
आज गुम सा ...
डूबा डूबा सा क्यूँ है ...?
संकुचित ,कहाँ दबी है ...
नारंगी सी  ...
वो सहज मुस्कान भीतर ....?

सिमटा-सिमटा सा ...
क्यूँ संकीर्ण हो गया है ...?
तेरे जाते ही नारंगी रंग भी -
स्याह हो गया है .....!!
प्रकाश कहीं खो गया है ...!!

इस अँधेरे में ...
अब तू क्या टटोल रहा है ....?
अपने मन में ही ढूंढ मुझे ....
मैं ही तेरी खिली सी मुस्कान हूँ .....
बस कुछ पल को सिमट गई हूँ ....
पर तुझसे दूर नहीं हूँ ...!!

मुझे ही ढूंढ रहा है न ....?
थाम  ले मुझे और निकल आ ...
इस अंधियारे से .....
 बिखर जा .....
चहुँ दिस ... चहुँ  ओर ......
मैं तो जानती हूँ .....
हैं  फिर  भी  कुछ  सुराख ...
जहाँ से ... 
बातों ही बातों में ....
ये अँधियारा निकल जायेगा ....
सहमी-सहमी सी ये रात ...
ये रात बीत जाएगी ...
और ...
तुझसे बात करते करते....
मेरी कविता भी ...
खिल -खिल जाएगी ....
जब निकल जायेंगे -
 मन के उदगार .......
विकीर्ण हो ,निकल आएगा -
सूरज भी उस पार .........
अब देख ....देख तो ......
रहा नहीं कोई अंदेशा ....
प्रभु ने भेजा है संदेशा  .....
अहीर भैरव सी ...आनंदमयी  भोर भई .......
फिर भर ले मन की  उड़ान .......
उज्जवल ...खिला-खिला खुला -खुला है आसमान ...!

 *अहीर भैरव  प्रातः का संधिप्रकाश राग है ...!

16 April, 2012

धरा को ही दे दूं ...!!

भुवन  में भवन  मेरा ..
हरित हरिमय हरा   हरा ..
धरा की धरोहर ...
धरा का रूप मनोहर...

ये रंग धरा का ..
प्रारूप धरा का ...
धारिणी,धरित्री बन ..
 ...काश कुछ तो  सहेजूँ.....
बिखरा है जैसे ...
दूर्वा सा मुलायम भावों का स्पर्श यहाँ .......
छनी हुई धूप की हलकी मुस्कान यहाँ  ...
खिल गए असंख्य पुष्प,नए कीर्तिमान जहाँ ...
मूक नहीं...कुछ कहती है ये धरा वहाँ ....
हरी हरी खिली खिली हमसे ......
आच्छादित जैसे हरियाली यहाँ ...
हर पल हो खुश हाली भी यहाँ ......
यही भाव सहृदय   भर लूं ..
हरियाली कि छटा नैन हर ...
शुद्ध वायु से प्राणवायु भर ...
कुछ  मन हरा कर लूं ......!!!

चलूं ...चलूँ चलूँ ......
एक संकल्प लूं ....
हरि हरि ...कुछ तो मैं भी ...हरा -हरा कर दूं ...!!
धरा ने दिया है जीवन यहाँ पर ....
कुछ हरियाली मैं भी ...
धरा को ही दे दूं ....!!

हमारी धरा कि हरियाली का संरक्षण हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है ... ....!!किन्तु ...ऊंची अट्टालिकाओं में...इस जगमगाती रौशनी में ...इस विकास के अपनी ही बनायीं हुई धारणा में ...हम अपने को ही खोते जा रहे हैं .....!!प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं ....!मायूस होते जा रहें हैं ....!!
आप जानते हैं न  ....किसी को इस वापसी का इंतज़ार है ....!!
चलें ...?.....स्वयं के घर ,अपने ही घर ......कोई हमारी राह देख
रहा है .........................................................................

इस बरसात में प्रण लें कुछ वृक्ष लगाने का ........!!!!!!!!



10 March, 2012

मेरी बुलबुल मुझे बहुत भाती है ... !!

चहकते हैं ...बुलबुल की बोली में ...
मन की झोली में ..
अबकी होली में ...
Scarlet Tanager (Piranga olivacea)
काफी ठाट के राग ....
कभी षडज-मध्यम के संवाद ...!!
बागेश्री जैसे ....!!

या षडज पंचम के संवाद ...
काफी..भीमपलासी जैसे ..!!

ये  रंग  ...ये  उमंग ...
डुबकी  लगाती हिय बोर-बोर ...
Golden Pheasant(Chrysolophus pictus)
फिर-फिर  ..फुदक-फुदक ..पंख झटकाती......
हुलसाती ..झड़-झड़  छिटकाती रंग .....
 खेले होरी धरा के संग ...
काफी राग के रंग ...

ज्यों उड़त अबीर  गुलाल ...
लाल-लाल ..
बैंगनी ..हरा गुलाबी
नीला पीला  ..चटकीला ...
सप्त सुरों की
उठती सतरंगी...तरंग .....
डाल-डाल फुर-फुर ..उड़-उड़ .....
रंग लिए उड़ जाती है ....
धरा पर बिखरी अद्भुत छटा का ...
पंखों  में रंग भर लाती है ... ...
फिर धरा पर ही झटकाती है ..छिटकाती है ....उड़ जाती है ...........  ...

आज फिर मेरी बुलबुल ....
मुझे सतरंगी रंगों से जुड़ना सिखाती है ...!!!
राग ''काफी "गाती है ....
मेरी बुलबुल मुझे बहुत भाती है ... !!

*जब हम राग बागेश्री गाते हैं तो तानपुरे पर षडज के साथ मध्यम बजाया  जाता है ।बागेश्री गाने के लिए उचित श्रुति तभी मिलती है ....!!
*होली काफी  राग में ही ज्यादातर गाई जाती है ..!
*बागेश्री ,काफी और भीमपलासी ...ये तीनो ही काफी ठाट के राग हैं ....!!

05 March, 2012

हंसकर जीवन ऐसे जिया ...!!!!!

जीवन का भार ...अपने अपने हिस्से का ...सभी वहन  करते हैं ...!!संवेदनशील मन संवेदना से जुड़ा ही रहता है .....कभी लगता है ......जीवन में दुखों का अंत ही नहीं .........!!फिर भी मन के अन्दर  एक ज्वलंत जिजीविषा ऐसी हो ,जो बुझने नहीं देती हो मन को तो .......?तो ......बहती है सरिता... मन की सरिता ....''अनुभूति ''लिए ....

पता नहीं ये भी क्या प्रारब्ध रहा ...दोनों माताओं को ...माँ को ,सासू माँ को ..अपने हाथों नहला धुला कर तैयार कर ....अंतिम यात्रा के लिए भेजा ....अपनी माँ को उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक हम बहनों ने कन्धा भी दिया ...मेरे श्वसुर हिंदी के प्रकांड विद्वान थे ....बहुत दुलार मिला उनका भी ...उन्हीं के आशीर्वाद से शायद, हिंदी मेरी इतनी प्रिय हो गयी है ...उन्होंने हिंदी की कई पुस्तकें लिखीं ....आज उन्हीं की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ....इतना भावविभोर है मेरा मन ...! पूरे परिवार में हर्ष की लहर है ...''पुत्रवधू पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ा रही है ''...!!....मेरे लिए मेरा कविता संग्रह ''अनुभूति ''बहुत बड़ी बात है !!किसी भी पुरस्कार से बड़ी .....
अनुभूति लिए आज जीवन के एक पड़ाव पर खड़ी  हूँ मैं ...!!



मेरी अनुभूति के प्रेरक .......जो मेरी प्राणवायु हैं ....मेरे पिता (ऊपर फोटो में ,नीली टाई में )जो मेरे साथ रहते हैं ....हर  पल जिनका आशीर्वाद मुझे मिलता ही रहता है ... शायद इसलिए कायम है कुछ बचपना अभी भी मुझमे ......!!मेरे पति ...कर्मठ,शांत ...धीर गंभीर ,बुद्धिजीवी ,मेरी हर कविता में साझेदारी है उनकी ...मेरी हर कविता के प्रथम श्रोता ,... मुस्कुराते मूक प्रशंसक ...प्रथम आलोचक भी ....!!....बिन मांगे ही जिन्होंने सब कुछ दिया ...समय से हर भाव मेरा पल्लवित किया ...!!मेरे दोनों पुत्र .....अभिषेक और अधीश ....जिनकी माँ-माँ सुनने पर आज भी मैं सारी दुनिया भूल जाती हूँ ......!!भरा-पूरा बहुत बड़ा परिवार ....किसी की दीदी ...किसी की मौसी,बुआ ...भाभी,मामी,चाची ताई जी .....रिश्तों में कोई कमी नहीं .....और फिर कुछ ऐसे दोस्त ..मेरे पिता के पीछे बैठी ,मेरी उपस्थित प्रिय सखियाँ ....बहुत हैं जो उपस्थित नहीं भी हो सके ......जो शायद मुझे मुझसे ज्यादा जानते हैं ...कैसे समेटूं अपने भाव .....इतना बिखराव ....बहुत कुछ याद करने का ...लिखने का मन है ....शायद एक ग्रन्थ ही भर जाये

........ह्रदय से  आभार  व्यक्त  करना  चाहती  हूँ श्री डी.पी.त्रिपाठी जी ,(विचार  न्यास  के अध्यक्ष और ''थिंक इण्डिया '' मैगज़ीन के एडिटर इन चीफ तथा N.C.P के चीफ स्पोक्सपर्सन )का ,अपनी इतनी व्यस्तता के बावजूद मुझे आशीर्वाद देने वहां पधारे ...!!श्रीमती एवं  श्री राकेश त्रिपाठी जी का ,श्री निहाल अहमद जी का .......देवेश त्रिपाठी जी का ....जिन्होंने अपने स्नेह से अनुभूति को अभिभूत किया ....!!




''एक सांस मेरी ''इसका विमोचन भी उतना ही महत्व पूर्ण है .....!!रश्मि दी के साथ साथ यशवंत जी का भी आभार इसके संपादन में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए ...!!इसमें गुंजन अग्रवाल ,एम्.वर्मा जी,प्रियंका राठौर,डॉक्टर राजेंद्र तेला निरंतर,अंजना दयाल,नीलिमा शर्मा और दुलीचंद कश्यप जी की कविताओं के साथ मेरी भी कविताओं का संग्रह है ...!!





मैं रश्मि दी और अरुण जी को तहे दिल से आभार देना चाहती हूँ ......उन्हीं के सहयोग और सौहाद्र से ही यहाँ तक की यात्रा संभव हो सकी ....!!...!!सलिल जी आपका  आभार ''अनुभूति '' को अपने शब्दों में वहां उपस्थित लोगों तक पहुँचाने के लिए...!!मेरे स्वरों की अनुभूति इस अनुभूति में छुपी ही है ..!आपका आभार आपने मुझे गीता पाठ करने का अवसर दिया .... उन छुपे हुए स्वरों को मुखरित होने का अवसर दिया ....!!सभी ब्लोगेर मित्रों का आभार जिनसे पहली बार वहां मुलाकात हुई पर ऐसा लगा ही नहीं जैसे पहली बार मिले .....हरकीरत हीर जी ,वंदना गुप्ता जी,अनु (अंजू ) चौधरी जी ,गुंजन,सुनीता शानू जी ,शिवम् मिश्र जी ,मुकेश सिन्हा जी ,अभिषेक,आनंद द्विवेदी जी ,महफूज़ जी ,एम् .वर्मा जी ,अविनाश वाचस्पति जी ,और भी बहुत सारे  ब्लोगेर मित्र जो वहां उपस्थित थे ।सभी से मुलाकात हुई ।मिलकर बहुत अच्छा लगा ..!
इमरोज़ जी से भी मिलाकत हुई |कुछ लोग इस धरा के लगते ही नहीं हैं ...!!ऐसी ही शख्सियत है उनकी ...!!निश्छल ...कोमल ...प्रेम ही प्रेम ....


आनंद भाई आभार ...इस तस्वीर के लिए ...!!


पांच मार्च ...आज मेरी माँ की पुण्य तिथि है ।   मेरी  रचना मेरी दोनों माताओं ...मेरी माँ और सासू माँ दोनों को समर्पित हैं ...क्योंकि दोनों ही बहुत हंसमुख थीं ....!!और दोनों ने रिश्तों को भरपूर जिया ...!!बहुत मृदुभाषी थीं .....कड़वा बोलना जानती ही नहीं थीं ...मुझे याद है ...कैसे हंसकर बहुत सारी  कड़वी बातें जैसे पी जाया करती थीं ..शायद उन्हें कुछ बुरा लगता ही नहीं था ......मैं ताज्जुब करती थी सदा उनकी सहनशीलता पर ....उन्हीं दोनों की याद में समर्पित है आज की रचना ....कई बार उनकी याद करते हुए मैं सोचती हूँ ...


हंसकर जीवन कैसे जिया ....?
शब्द शब्द में ....
भाव का जब प्रादुर्भाव हुआ .......
तब शब्दों को नहीं ...
भावों को ही लिया ...
संस्कारों में ...जीवन में ...
अभिव्यक्ति में ....
भावों को ही जिया ...
चुनाव था ,है ,रहेगा सर्वथा यही एक मेरा ...
इस  जीवन पथ पर ...
शब्द  शब्द ...भाव  ही बने ....

शब्द शूल नहीं ...फूल ही बने ...!!

जब शूल नहीं ...
फूल का चुनाव किया ..
जैसे भी हो ...
मन को क्रोध से , विषय से ...
विषाद  से विमुख किया ...!!
 कहे  गए  शब्दों  से  भी  ...

खोज-खोज...ढूंढ-ढूंढ .. ,
सुंदर सुसंस्कृत भावों को ही लिया ...
उन्हीं  को जिया ...
प्रेम ही दिया ...प्रेम ही लिया ...
जब प्रेम से हंसकर गरल  पिया ...
तब ही जीवन सरल किया ....
 ..हंसकर जीवन ऐसे  जिया ...!!!!!

इस  को पढ़ते ही .... .... दोनों माताओं के आशीष का स्पर्श अनुभव कर सकती हूँ ......!!बहुत पहले की लिखी रचना है ये ....जब भी मन उदास होता है इसे पढ़ लेती हूँ .......अपने आप उदासी दूर हो जाती है ...!!

लिखने वाला कुछ भी लिखे ....पढने वाला ही कृति को जीवित करता है ...!!...तो मेरे लिए आप सब के भाव ,आपकी प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है ...!!...!!अब तक के .....इस छोटे से लेखन जीवन में त्रुटियाँ अवश्य की होंगी ....जिसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ....!!आभार पुनः आप सभी का ....

अनुभूति के इस पड़ाव  से अत्यंत संतुष्ट ...अगले पड़ाव के लिए ...यात्रा जारी है .............................

25 February, 2012

रहे अक्षय मन .....!

हे नाथ ..!हे द्वारकाधीश ...
करो कृपा ..इतना ही दो आशीष ..!!
कई बार व्यथित हो जाता मन ..
नहीं सोच कहीं कुछ पता मन ..
दुःख में ही क्यूँ घबराता मन ...?
है सांस नहीं पल पता मन ...!!
अपने दुःख से ,
घर भर को मैं परेशान करूँ ...!!
मन आहत , कैसे विश्राम करूँ ..?
दुःख  भार स्वयं ही ...
कैसे वहन करूँ ...?
तब ,क्या संभव है ...
नहीं किसी को व्यथित करूँ .....?

क्षय विक्षय से दूर करो ..
बुद्धि विवेक आलोक दो ऐसा ...
स्वाद्ध्याय पर अविचल ..अडिग रहूँ .. ....
न हो संशय स्वजनों पर ....!!

मेरे नैनो पर छाया कैसा आवरण .....
करो क्षोभ हरण ..
हे उज्जवल कान्त ...स्निग्ध प्रशांत ...
हाथ  पकड़  उत्थान  करो  मेरा  ...
तब ..दे दो ऐसी सुर लहरी ...सगुन भक्ति ...
तुममें खो जाऊं ...
तुम्हारा ही गान  गाऊं.....मान  बढाऊं ..


मंजीरा  बाज  उठे  मन  का  ..
 रहूँ मुदित ..प्रमुदित ..जीते हुए ये जीवन ...!!


निर्निमेष ..अनिमेष देख तुम्हें हर पल ही ...
शुभ्र ज्योत्स्ना ..ग्रहण करूँ ..
शुभ्र चेतना का प्रसार हो ...
हो  शुभ जीवन ...चरणामृत  बरसे .....
अमृतमय  आप्लावित रहे ..
...रहे अक्षय मन ...

05 February, 2012

रीत जीवन की .......

हँसते  हँसते जब आँख भर आई ...
धुंधली सी पड़ने लगी ...
बासंती अमराई ...!

धुंधलका सा छाने लगा ...
गया ही कहाँ है बसंत ...
क्या  पतझड़ आने लगा ..?
भयभीत ...
मन मौन फिर छाने  लगा ...!

किसलय अनुभूति क्षण की ....
प्रतिपल पुलक देती प्रतिक्षण की ..
ये भी क्या रीत जीवन की ...?
डोले पवन  गाए राग   हिंडोल ...
बसंत  का जैसे तराना  हुआ ...
द्रुत लय होती चली गयी ......
सांय सांय पवन बहती चली गयी ....... 
लो झड़ने जो लगे पीले पके से पात ..
इस  तरह   पतझड़ का...
क्यूँ आना हुआ ..?

 बस  कहने की बातें हैं .....
अडिग रह कर ..
काँटों भरी राह पर चल कर .. ...
जीवन  से  प्रीती  कहाँ  ..संजो पाते हैं .....?
हम कहाँ  मन को समझाते हैं ...सुलझाते हैं ...?
सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते  हैं ...?
बस  रीत प्रकृति  की ही  निभाते  हैं ।

बसंत में खिलते हैं ....
पतझड़ में ..फिर  बसंत के इंतज़ार में ...
अनकहे शब्द ..मौन रह  जाते हैं ......


रीत जीवन की ही निभाते रह जाते हैं ....!!
सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते हैं ...??


*हिंडोल -राग का नाम है जो बसंत ऋतू में गयी जाती है ...
*तराना -नोम तोम दिर ताना ...इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर बंदिश लेते हैं ...जिसे तराना कहते हैं ...!