नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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04 July, 2013

चंपई गुलाबी पंखुड़ी पर ...


स्मित  बनफूलों का
सौम्य तारुण्य ...!!
चंपई गुलाबी  पंखुड़ी पर ...
चाँदनी  का
चांदी सा छाया लावण्य ...!!
भीनी भीनी सी खुशबू  ले .....
बहती हुई ये अलमस्त पवन ...
बूंद बूंद बरस रहा है ...
मेघा का रस पावन ...

स्निग्ध  चांदनी में डूबा
कल्पनातीत वैभव ....
सरसता  हुआ मन ...!!
रुका  हुआ क्षण ...!!
अनिमेष सुषमा का ,
कर रहा रसास्वादन .....!!!!

अंबर की  रस फुहार ....
हो रही बार-बार ....
बरस रहा आसाढ़ ......
भीग रहा मन चेतन ...!!

कैसी अनुभूति है ...??
छुपी कोई अदृश्य आकृति है ....???
कौन है यहाँ
जो मुझे रोक लेता है ...????
नमन करने तुम्हारी कृति पर ...
और ...अपनी सीली सीली सी ...
मदमस्त सुरभि से ...
तुम्हारी उपस्थिति का भान कराता है ...

मेरे  ह्रदय के आरव   श्रृंगों  को .....
भिगोने लगता  है
वाणी के उजास  से ......
चेतना आप्लावित  होती है
अंतस तक ....!!
और इस तरह
तुम ही करते हो ....
मेरा मार्ग प्रदर्शन ....
और प्रशस्त  भी ....!!




10 March, 2012

मेरी बुलबुल मुझे बहुत भाती है ... !!

चहकते हैं ...बुलबुल की बोली में ...
मन की झोली में ..
अबकी होली में ...
Scarlet Tanager (Piranga olivacea)
काफी ठाट के राग ....
कभी षडज-मध्यम के संवाद ...!!
बागेश्री जैसे ....!!

या षडज पंचम के संवाद ...
काफी..भीमपलासी जैसे ..!!

ये  रंग  ...ये  उमंग ...
डुबकी  लगाती हिय बोर-बोर ...
Golden Pheasant(Chrysolophus pictus)
फिर-फिर  ..फुदक-फुदक ..पंख झटकाती......
हुलसाती ..झड़-झड़  छिटकाती रंग .....
 खेले होरी धरा के संग ...
काफी राग के रंग ...

ज्यों उड़त अबीर  गुलाल ...
लाल-लाल ..
बैंगनी ..हरा गुलाबी
नीला पीला  ..चटकीला ...
सप्त सुरों की
उठती सतरंगी...तरंग .....
डाल-डाल फुर-फुर ..उड़-उड़ .....
रंग लिए उड़ जाती है ....
धरा पर बिखरी अद्भुत छटा का ...
पंखों  में रंग भर लाती है ... ...
फिर धरा पर ही झटकाती है ..छिटकाती है ....उड़ जाती है ...........  ...

आज फिर मेरी बुलबुल ....
मुझे सतरंगी रंगों से जुड़ना सिखाती है ...!!!
राग ''काफी "गाती है ....
मेरी बुलबुल मुझे बहुत भाती है ... !!

*जब हम राग बागेश्री गाते हैं तो तानपुरे पर षडज के साथ मध्यम बजाया  जाता है ।बागेश्री गाने के लिए उचित श्रुति तभी मिलती है ....!!
*होली काफी  राग में ही ज्यादातर गाई जाती है ..!
*बागेश्री ,काफी और भीमपलासी ...ये तीनो ही काफी ठाट के राग हैं ....!!

05 February, 2012

रीत जीवन की .......

हँसते  हँसते जब आँख भर आई ...
धुंधली सी पड़ने लगी ...
बासंती अमराई ...!

धुंधलका सा छाने लगा ...
गया ही कहाँ है बसंत ...
क्या  पतझड़ आने लगा ..?
भयभीत ...
मन मौन फिर छाने  लगा ...!

किसलय अनुभूति क्षण की ....
प्रतिपल पुलक देती प्रतिक्षण की ..
ये भी क्या रीत जीवन की ...?
डोले पवन  गाए राग   हिंडोल ...
बसंत  का जैसे तराना  हुआ ...
द्रुत लय होती चली गयी ......
सांय सांय पवन बहती चली गयी ....... 
लो झड़ने जो लगे पीले पके से पात ..
इस  तरह   पतझड़ का...
क्यूँ आना हुआ ..?

 बस  कहने की बातें हैं .....
अडिग रह कर ..
काँटों भरी राह पर चल कर .. ...
जीवन  से  प्रीती  कहाँ  ..संजो पाते हैं .....?
हम कहाँ  मन को समझाते हैं ...सुलझाते हैं ...?
सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते  हैं ...?
बस  रीत प्रकृति  की ही  निभाते  हैं ।

बसंत में खिलते हैं ....
पतझड़ में ..फिर  बसंत के इंतज़ार में ...
अनकहे शब्द ..मौन रह  जाते हैं ......


रीत जीवन की ही निभाते रह जाते हैं ....!!
सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते हैं ...??


*हिंडोल -राग का नाम है जो बसंत ऋतू में गयी जाती है ...
*तराना -नोम तोम दिर ताना ...इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर बंदिश लेते हैं ...जिसे तराना कहते हैं ...!