नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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21 March, 2014

कुछ पलाश के अनमोल पल दे जाता है ……!!

अबके बसंत बरसा है फाग ……
पलाश के रंग में भीगी हूँ इस तरह ,
लगता है शब्दों के अंबार पर बैठी हूँ मैं
यहाँ सब कुछ मेरा है
रूप अरूप स्वरुप ……
सब कुछ,
तुम्हारे शब्द भी मेरे हैं अब ,
तुम्हारे भाव भी मेरे हैं अब ,
 मेरा अपना एकांत,
और तुम से मिले मेरे अपने शब्द ...!!
किन्तु  बोध मेरा अपना ही ...
और तुम से सजी
मेरी प्रिय आकृति
आकाश  पर चलचित्र की भांति
छाया सी उभरतीं ,
खिल जाता है मेरा  एकांत ,
बरसाता है मुझ पर
मेरी ही पसंद के अनेक शब्द
पंखुड़ियों से
यूं करता अठखेलियाँ ,
छुप छुप कर झाँकता  है,
कभी पहुँच जाता है मुझ तक
कभी फिर छुप जाता है   ....
फिर कभी चुपके से आता है  …
कुछ सपनो के ,कुछ भावों के
कुछ पलाश  के अनमोल पल दे जाता है    ……!!


15 March, 2014

अबकी होरी ....(हाइकु )



प्रेम की बोली ,
रंग रंगीली होली
चन्दन रोली

सूर्योदय सी
उदित प्रमुदित
खिली आशाएँ

शुभ जीवन
राग अनुराग सा ,
खिला है मन

लाई प्रभास
किरणों की टोली
आई है होली

मन पलाश
ज्यों  अबीर गुलाल
है लाल लाल

शील संतोष
केसर रंग घोरी
अबकी होरी


शुभकामना
रंग माथे लगाऊँ
होरी रचाऊँ


है रंग रंग
सतरंग उमंग
बाजे मृदंग

रंग अबीर
गुलाल लाल लाल
मचा धमाल

भई पलाश
रंग गई मनवा
अबकी होरी


मन रसना
रंग भरे सपने
नैन बसना

रंग लगाऊँ
पलाश बोरी घोरी
अबकी होरी

भव सागर
पार करो श्यामा
भरो गागर

प्रीत चढ़ाऊँ
संग श्यामा के नाचूँ
फागवा गाऊँ

मन मोहन
मैं बांस की बांसुरी
उर आनंद

रंगी गुलाबी
ओढ़ी प्रीत पिया  की
खिला जीवन


बरस रहा
बादलों से फागुन
शुभ सगुन

गावन गुण
बरसता  फागुन
सरस मन  

13 March, 2014

तुम मुझे बहुत अपने से लगते हो

रुके हुए से शब्द
ढलक जाते हैं ...
अनायास ...
बिन मौसम भी
बरस जाते हैं नयन कभी ..
फिर भी क्यूँ
झरती हुई बारिश
आँख के कोरों पर रुकी हुई
नहीं दिखा  पाती है
हृदय के समुंदर में छुपे
कुछ  अनमोल  मोती ........!!
*************************************

अपने ही भीतर ढूंढती हूँ खुशी जब ,
तुम मुझे बहुत अपने से लगते हो ,
बंद है मुट्ठी मेरी,
सम्बल  है मेरे पास तुम्हारा ,
मेरे सभी अपनों  का ,
और बढ़ता  जाता है
रोज़ इसका दायरा ,
तभी तो 
दुख में भी
होती तो है बिन मौसम बरसात
फिर भी 
गिरते नहीं आँख से आँसू 
और सुख में 
हँसते हँसते 
आँख छलछला जाती है ...!!

..

18 January, 2014

सौन्दर्य बोध


कोलाहल में शून्यता
स्वार्थ से परमार्थ का बोध
अपने से अपनों तक
और अपनों से अपने तक
सत्य स्वत्व है
निज घट यात्रा
एक अनुभूति
सबकी  अपनी
टुकड़ों टुकड़ों में बिखरी
माला सी गुंथी स्वयं मे ,
ईश्वर रूप
मूर्त में अमूर्त सी
प्रत्येक मनुष्य के ह्रदय में
ईश्वर तक की पहुँच है
स्थिरता है   ……
भटकन नहीं है
एक खोज सबकी अपनी अपनी .....
अनकही अनसुनी सी
एक  अनुभूति ईश्वरीय
सत्य का बोध ही
 सौन्दर्य बोध
सत्यम शिवम् सुंदरम है

04 July, 2013

चंपई गुलाबी पंखुड़ी पर ...


स्मित  बनफूलों का
सौम्य तारुण्य ...!!
चंपई गुलाबी  पंखुड़ी पर ...
चाँदनी  का
चांदी सा छाया लावण्य ...!!
भीनी भीनी सी खुशबू  ले .....
बहती हुई ये अलमस्त पवन ...
बूंद बूंद बरस रहा है ...
मेघा का रस पावन ...

स्निग्ध  चांदनी में डूबा
कल्पनातीत वैभव ....
सरसता  हुआ मन ...!!
रुका  हुआ क्षण ...!!
अनिमेष सुषमा का ,
कर रहा रसास्वादन .....!!!!

अंबर की  रस फुहार ....
हो रही बार-बार ....
बरस रहा आसाढ़ ......
भीग रहा मन चेतन ...!!

कैसी अनुभूति है ...??
छुपी कोई अदृश्य आकृति है ....???
कौन है यहाँ
जो मुझे रोक लेता है ...????
नमन करने तुम्हारी कृति पर ...
और ...अपनी सीली सीली सी ...
मदमस्त सुरभि से ...
तुम्हारी उपस्थिति का भान कराता है ...

मेरे  ह्रदय के आरव   श्रृंगों  को .....
भिगोने लगता  है
वाणी के उजास  से ......
चेतना आप्लावित  होती है
अंतस तक ....!!
और इस तरह
तुम ही करते हो ....
मेरा मार्ग प्रदर्शन ....
और प्रशस्त  भी ....!!