नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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19 September, 2014

क्षणिकाएं.....!!

रे मन
प्रेम पर  ठहरी हैं
झील  सी गहरी हैं
तोरे मन की बतियाँ ......
********************
प्रवृत्ति है ये जल की ,
जल  भी
जब कभी नदी सा
कल कल कल कल ....
बह नहीं पाता
तब भी रुका हुआ .....
यह जल ,
सरोवर में,
ठहरा हुआ ,
शब्दों    के  हृदय कमल
  है खिलाता !!

21 March, 2014

कुछ पलाश के अनमोल पल दे जाता है ……!!

अबके बसंत बरसा है फाग ……
पलाश के रंग में भीगी हूँ इस तरह ,
लगता है शब्दों के अंबार पर बैठी हूँ मैं
यहाँ सब कुछ मेरा है
रूप अरूप स्वरुप ……
सब कुछ,
तुम्हारे शब्द भी मेरे हैं अब ,
तुम्हारे भाव भी मेरे हैं अब ,
 मेरा अपना एकांत,
और तुम से मिले मेरे अपने शब्द ...!!
किन्तु  बोध मेरा अपना ही ...
और तुम से सजी
मेरी प्रिय आकृति
आकाश  पर चलचित्र की भांति
छाया सी उभरतीं ,
खिल जाता है मेरा  एकांत ,
बरसाता है मुझ पर
मेरी ही पसंद के अनेक शब्द
पंखुड़ियों से
यूं करता अठखेलियाँ ,
छुप छुप कर झाँकता  है,
कभी पहुँच जाता है मुझ तक
कभी फिर छुप जाता है   ....
फिर कभी चुपके से आता है  …
कुछ सपनो के ,कुछ भावों के
कुछ पलाश  के अनमोल पल दे जाता है    ……!!


15 March, 2014

अबकी होरी ....(हाइकु )



प्रेम की बोली ,
रंग रंगीली होली
चन्दन रोली

सूर्योदय सी
उदित प्रमुदित
खिली आशाएँ

शुभ जीवन
राग अनुराग सा ,
खिला है मन

लाई प्रभास
किरणों की टोली
आई है होली

मन पलाश
ज्यों  अबीर गुलाल
है लाल लाल

शील संतोष
केसर रंग घोरी
अबकी होरी


शुभकामना
रंग माथे लगाऊँ
होरी रचाऊँ


है रंग रंग
सतरंग उमंग
बाजे मृदंग

रंग अबीर
गुलाल लाल लाल
मचा धमाल

भई पलाश
रंग गई मनवा
अबकी होरी


मन रसना
रंग भरे सपने
नैन बसना

रंग लगाऊँ
पलाश बोरी घोरी
अबकी होरी

भव सागर
पार करो श्यामा
भरो गागर

प्रीत चढ़ाऊँ
संग श्यामा के नाचूँ
फागवा गाऊँ

मन मोहन
मैं बांस की बांसुरी
उर आनंद

रंगी गुलाबी
ओढ़ी प्रीत पिया  की
खिला जीवन


बरस रहा
बादलों से फागुन
शुभ सगुन

गावन गुण
बरसता  फागुन
सरस मन  

18 August, 2013

भज मन हरि हरि......!!




ईश्वर पर है पूर्ण विश्वास मुझे
मैं पत्थर में भगवान पूजती  हूँ ...!!

और  लिखती   हूँ
.....भज मन हरि हरि ......!!
अहम तुम्हारी सोच है
मेरी कविता नहीं

लिखी हुई बंदिश मेरी
निर्जीव है
कृति मेरी सूर्योदय है या सूर्यास्त है ...??

तुम पढ़ते हो और
फूंकते  हो उसमें प्राण
अपनी सुचारू भावनाओं के
सजल श्रद्धा ....प्रखर प्रज्ञा

तुम्हारे सुविचारों से ....सनेह से
 स्वयं के उस संवाद से
उपजती है संवेदना


और ये  संवेदना ही तो करती है प्रखर
मेरे सभी भावों को
तब ...समझती है
मुस्कुराती  है .....!!

जब संवेदना मुस्कुराती  है
तब ही तो निखरता है
मेरी कविता का सजल सा
शुभ प्रात  सा
उज्जवल सा ...स्वरूप
सूर्योदय  सा ......!!
खिला खिला सा ........!!


लिखे हुए शब्द तो मेरे
उस पत्थर की तरह हैं
जिसमें तुम अपनी सोच  से
फूंकते हो प्राण

पाषाण सी
मैं तो कुछ भी नहीं
पूज्य  तो  तुम ही बनाते हो मुझे
मील का पत्थर भी
फिर  क्यों ठोकर मारकर
बना देते हो राह पड़ा पत्थर कभी ...?????

सच ही है न
अहम तुम्हारी सोच है
मेरी कविता नहीं

मेरी सोच देती है
मेरी पत्थर सी कविता को तराश
और भर देती है
मेरी पत्थर सी कविता में झरने सी उजास
तुम्हारी सोच  देती है -
मेरी पत्थर सी कविता  को वजूद ......!!



हाँ .......और तब .......तुम्हारी ही सुचारु सोच देती है ...
मेरी कविता  को उड़ान  भी .........!!



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सोच से जुड़े ....समझ से जुड़े .........!!उसी से बनी हो शायद कोई कविता ......और हमारा आपका क्या रिश्ता है ...???सोच ही तो जोड़ती है हर इंसान को हर इंसान से ........!!!यही तो मानवता है .............!!!!!!!!!