नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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23 June, 2012

मैं किस बिध तुमको पाऊँ प्रभु..?

मैं किस बिध तुमको  पाऊँ प्रभु..?

अब अखियन  नीर बहाऊँ प्रभु ...
पग धरो श्याम मत बेर करो ...
मन मंदरवा   सुधि-छाप धरो..
अब  अंसुअन पांव पखारूँ प्रभु ...

मैं किस बिध तुमको  पाऊँ प्रभु..?

मन का इकतारा बाज रहा ..
सुर बिरहा  आकुल साज रहा ...

तुम कौन गली ....ऋतु बीत चली ....!
मेरे हिरदय मधु  प्रीत पली ...
तुम कौन गली ....ऋतु बीत चली ...
निज  प्राण पखेरू निकसत हैं ...
मन सुमिरत वंदन गावत है ...
तरसत मन  अब हरि दरसन दो ....
हरो पीर मेरी ...तर जाऊँ प्रभु ...!!

मैं किस बिध तुमको  पाऊँ प्रभु..?

15 June, 2012

कारे मतवारे घुँघरारे बदरवा ....!

धरा पर छाते हैं ...मन को लुभाते हैं ..
घूम घूम घिरते हैं ...मतवारे   बदरवा ...
कैसे उड़ते है ......कारे बदरवा ....
कारे मतवारे घुँघरारे बदरवा .. ...... .....!!

उड़ते हवा के संग-संग ..
उलझी-उलझी लटों जैसे...
कुछ   उलझे-उलझे  .......
उड़ते--उड़ते ...लट उलझाते ...
मन छू  जाते ...!!

उमड़ते  ..घुमड़ते ....
जैसे नयना नीर भरे ...
भर-भर नीर भर लाते ..
कारे मतवारे कजरारे बदरवा ....!!

अखियन से मन  तक उतराते ...
नैनन बन जाते  कजरवा ...
मन में बजाते कहरवा ...
जीवन से सुर-ताल मिलाते ...
कुछ कह जाते ...कुछ सुन जाते ...
कुछ दे जाते ...कुछ ले जाते ..
भरमाते ...उड़ जाते ...
कारे मतवारे कजरारे बदरवा ....!!


छाये मोरे देस  आज ....कारे कारे  बदरवा ....!
बरसन   आये मोरे देस आज  ...
कारे कारे  बदरवा ....
कारे मतवारे घुँघरारे बदरवा ....!

29 April, 2012

खिला-खिला खुला -खुला है आसमान ...!

स्मित ....सलोनी सी मुस्कान ...
विलुप्त हो गयी ....
..रे मन .....
आज गुम सा ...
डूबा डूबा सा क्यूँ है ...?
संकुचित ,कहाँ दबी है ...
नारंगी सी  ...
वो सहज मुस्कान भीतर ....?

सिमटा-सिमटा सा ...
क्यूँ संकीर्ण हो गया है ...?
तेरे जाते ही नारंगी रंग भी -
स्याह हो गया है .....!!
प्रकाश कहीं खो गया है ...!!

इस अँधेरे में ...
अब तू क्या टटोल रहा है ....?
अपने मन में ही ढूंढ मुझे ....
मैं ही तेरी खिली सी मुस्कान हूँ .....
बस कुछ पल को सिमट गई हूँ ....
पर तुझसे दूर नहीं हूँ ...!!

मुझे ही ढूंढ रहा है न ....?
थाम  ले मुझे और निकल आ ...
इस अंधियारे से .....
 बिखर जा .....
चहुँ दिस ... चहुँ  ओर ......
मैं तो जानती हूँ .....
हैं  फिर  भी  कुछ  सुराख ...
जहाँ से ... 
बातों ही बातों में ....
ये अँधियारा निकल जायेगा ....
सहमी-सहमी सी ये रात ...
ये रात बीत जाएगी ...
और ...
तुझसे बात करते करते....
मेरी कविता भी ...
खिल -खिल जाएगी ....
जब निकल जायेंगे -
 मन के उदगार .......
विकीर्ण हो ,निकल आएगा -
सूरज भी उस पार .........
अब देख ....देख तो ......
रहा नहीं कोई अंदेशा ....
प्रभु ने भेजा है संदेशा  .....
अहीर भैरव सी ...आनंदमयी  भोर भई .......
फिर भर ले मन की  उड़ान .......
उज्जवल ...खिला-खिला खुला -खुला है आसमान ...!

 *अहीर भैरव  प्रातः का संधिप्रकाश राग है ...!