उर से -
आग लक्ष्य की ..
कभी बुझी नहीं .....
इन राहों पर .. मैं ..
इक पल भी ..कभी रुकी नहीं ......
पथरीले रास्तों पर चलते चलते ...
रिसने लगा खून .....
चलती रही मैं ...अनवरत ...
मूँद कर नयन ...एकाग्रचित्त ...
सुरों की माला जपती .......
स्वयं को बूझती...
फिर भी ...
स्वयं से अपरिचित ....!!
बीतता रहा समय ...
चलती रही मैं ...
अब ..धीरे धीरे होता जाता है ...
कुछ आभास तुम्हारी उपस्थिती का ...
और कुछ विश्वास मेरी प्रतीति का ... ...
हवा में फैली ..
तुम्हारी खुशबू है ...!!
जानती हूँ...
तुम्हें पहचानती हूँ ...
अनुनेह मेरा ग्रहण करोगे ...
निर्मोही नहीं हो तुम ...
क्योंकि जानते हो ...
दर्शन पाए बिना तुम्हारे ....
नयनो की प्यास बुझेगी नहीं ...
अंतर्मन की ...
ये ज्वाला बुझेगी नहीं ....!!
अपने भक्तों को
छटपटाता देख सकते हो .....
तो जलने दो मुझे ...
युगों युगों तक ऐसे ही .....
दर्शन पाए बिना तुम्हारे ...
तृषा से व्याकुल ...
जलती रहेगी मेरी काया ....!!
तपन जिया की बन के ...
प्रकट हो ....
हे प्रभु ...दर्शन दो ....!!
ज्ञान से पथ प्रशस्त करो ..
भव तार दो ...!!
.jpg)

