
धूप भी खिली हुई
घूप में खिला हुआ
रँग है बहार का
रँग वो ख़ुमार का
रँग वो ख़ुमार का
अभिराम वो दुलार का,
अभिरुप वो श्रृंगार का
मांग की लाली में जैसे
प्रियतम के प्यार का
रँग वो ख़ुमार का
उड़ेलता हुआ कभी
बिखेरता हुआ कभी
लहर लहर समुद्र पर
किरणों के प्यार का
रँग वो ख़ुमार का
अनुपमा त्रिपाठी
''सुकृति ''

