नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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25 August, 2021

धूप भी खिली हुई

 
धूप भी खिली हुई
घूप में खिला हुआ 
रँग है बहार का 
रँग वो ख़ुमार का 

रँग वो ख़ुमार का 
अभिराम वो दुलार का, 
अभिरुप वो श्रृंगार का 
मांग की लाली में जैसे 
प्रियतम के प्यार का 
रँग वो ख़ुमार का 

उड़ेलता हुआ कभी 
बिखेरता हुआ कभी 
लहर लहर समुद्र पर
किरणों के प्यार का 
रँग वो ख़ुमार का 


अनुपमा त्रिपाठी 
 ''सुकृति ''


05 February, 2014

मदमाया है अब बसंत ........!!


मन ने उमंग भरी ,तूलिका ने भरे रंग,
कोयलिया कूक रही ,बाजे है मन मृदंग ||

फूलों की चिटकन है ,रंगों की छिटकन है,
भँवरे की गुंजन है, छाया जो रंजन है !!

धूप में निखार आया रंग की बहार छाई ,
अमुआ की मंजरिया  देखो कैसी बौराई !!


पीत वसना धरती है ,धरती जो पीत वसन ,
धरती से अम्बर तक आया है अब बसंत !!

कंचन सी धूप खिली छाया है अब बसंत !!
सतरंगी चूनर, लहराया है अब बसंत
छाया है अब बसंत ....!!

राग है बहार संग मनवा है यूं मगन !
छेड़ो अब तान कोई ,लागी कैसी लगन,

प्रकृती में बिखरा चहुं ओर उन्माद है ,
हरस रही सरसों है प्रीति का आह्लाद है,

रंग है बहार है रूप का श्रृंगार है ,
खिलती हुई कलियों पर आया जो निखार है ...!!


सतरंगी ...पुष्पों  पर छाया है अब बसंत
मदमाती सुरभि लहराया  है अब बसंत ......!!

रोम रोम  पुलकित  ,मदमाया है अब बसंत ........!!