
बिन मांगे मोती मिले ,
कविता ऐसे ही मिल जाती है कभी !
जब मांगती रहती हूँ ईश्वर से ,न कविता आती है ,न भाव !!
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प्रीत के इक पल को
आँखों में पिरो लो,
मुक्ता सी बनके हृदय में ,
जा बसें ,
छलके न कोरों से कभी ,
हृदय में जो
बस चली अनुभूति तो ,
अभिभूत हो लो,
जानने से प्रेम को,
दे सको गर प्रेम ही ,
तो संजो लो..!!
परखने से ,तौलने से ,
फिर बढ़ाते वर्जना क्यों ...
मेरे वंदन को समझकर,
जानकर और मानकर भी ,
दूर जाना है अगर ,
फिर मेरे पथ के वही
अनजान से,
मासूम से राही रहो तुम ...!!!
ये मेरा अनुराग बिसराओ न ,
देखो,
सुनो ,समझो ......!!
क्या कहने की ये वेदना है ,
संवाद से संवेदना है !
संवेदना मेरी संजो लो ...... !!
संवेदना मेरी संजो लो ...... !!
तब बांचो अनमोल कथाएं ,
रहने दो …न जानो मुझको ,
बड़ी निर्मूल हैं मेरी व्यथाएं ……!!
अनुपमा त्रिपाठी
"सुकृति"
बड़ी निर्मूल हैं मेरी व्यथाएं ……!!
अनुपमा त्रिपाठी
"सुकृति"