असंख्य दिव्य रश्मियाँ
खिली हुई प्रभास सी ,
हैं दिव्य यूं दिशाएँ भी
कि माँ तुम्हें पुकारती ,
फ़लक पे छा रहा है नूर
लक्ष्य भी खिले हुए
उठो सपूत बढ़ चलो
ये पग हैं क्यों रुके हुए
माँ शारदा का हस्त भी
वृहद है यूं सपूत पर
कि गाओ मन के राग यूं
उदीप्त हों निखर ये स्वर....
खिले हुए कमल सी आजखिल रही दिशा दिशा,
है ज्योत्सना प्रकाशिनी
सुदीप्त है प्रखर निशा
के बढ़ चलो तरंग सी
निसर्ग की है रागिनी
के बढ़ चलो उमंग सी
देती है वीणा वादिनी ...!!
प्रबुद्ध मन का मार्ग है ,
खिला हुआ प्रशस्त भीहै सुरभि पुष्प की बही
समीर में उराव भी !!
जो हमने तुमने की थी बात
है अब समय रुको नहीं
जय भारती के पूत आज
है अब समय रुको नहीं
जय भारती के पूत आज !!

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