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22 January, 2012

माटी भी मोक्ष पा जाती है ...!!

कोमल  और कठोर ...
स्वप्न और यथार्थ ...
दो पहलू जीवन के ...
दो किनारे सरिता के ...!!


कभी कोमल स्वप्न ...
कठोर यथार्थ ...
कभी कठोर स्वप्न ...
कोमल यथार्थ ...!!


हैं  ये  
सत्य और मिथ्या की तरह ...
दो किनारे जीवन के ..
दो रूप मेरे  मन के ...!

इन्हीं दो किनारों के बीच ..
प्रवाहमान ...स्वच्छ पारदर्शी
नदिया का जल है जीवन ...
अपना ही मन है जीवन ...!

अनवरत बहते हुए भावों सा ..
छूते  हुए दोनों छोर ...
कभी कोमल एहसास लिए ...
भर अपनी अंजुरी  ..
कभी कठोर वायु के वेग से ..
विपरीत दिशा में भी बहते हुए ...
असहनीय वेदना ..सहते हुए ...!

कैसे बहता है ये निर्मल शीतल जल ...
सहनशीलता की पराकाष्ठा लिए हुए  ..
मिलकर इसमें...घुलकर इसमें...
माटी भी मोक्ष पा जाती है...!!

32 comments:

  1. गहन अभिव्यक्ति बेहतरीन भाव संयोजन लिए उत्‍तम रचना

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  2. सत्य और मिथ्या की तरह ...
    दो किनारे जीवन के ..
    दो रूप मेरे मन के ...!

    बहुत सुन्दर !!!
    kalamdaan.blogspot.com

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  3. anupmaaji,
    aapkee kavitaa ne mujhe bhee kuchh panktiyaan likhne ko prerit kar diyaa

    maati ki kismat hai ,
    saanidhy use jal kaa miltaa
    jo nirantar aviral bahtaa ,
    roke raastaa koi to
    nayaa raastaa banaataa
    bine ruke binaa thake
    har paristhitee mein
    nirantar chaltaa rahtaa

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  4. काँच सी चाहतें पत्थर सा यथार्थ और जीवन । बहुत भावमय कविता। बधाई।

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  5. बढ़िया प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 23-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. सुन्दर सृजन , सुन्दर भावाभिव्यक्ति.

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  7. गहन अभिव्यक्ति, बेहतरीन भाव, सुन्दर सृजन , सुन्दर भावाभिव्यक्ति.

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  8. इन्हीं दो किनारों के बीच ..
    प्रवाहमान ...स्वच्छ पारदर्शी
    नदिया का जल है जीवन ...
    अपना ही मन है जीवन ...!
    मन से अलग जीवन ही नहीं ...

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  9. मन के अन्दर तक पहुंचती हुई गहन रचना .बहुत अच्छी लगी !

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  10. सुन्दर भाव, गहन अभिव्यक्ति...

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  11. कोमल और कठोर ...
    स्वप्न और यथार्थ ...
    दो पहलू जीवन के ...
    दो किनारे सरिता के ...!!

    ठीक शब्द और विचार की तरह ...........

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  12. न जाने कितनी दूर तक किनारों में सिमटी, प्रवाह में लिपटी, बही जा रही है नदी..

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  13. कोमल और कठोर ...
    स्वप्न और यथार्थ ...
    दो पहलू जीवन के ...
    दो किनारे सरिता के ...!!
    बहुत ही आसानी से बहुत ही कठिन बात समझा दी आपने,यथार्थ...

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  14. आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट "धर्मवीर भारती" पर आपका सादर आमंत्रण है । धन्यवाद ।

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  15. बहुत सार्थक गहन भाव की अभिव्यक्ति सुंदर रचना,बेहतरीन पोस्ट....
    new post...वाह रे मंहगाई...

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  16. सुंदर , गहन भाव लिए पंक्तियाँ

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  17. जीवन की सुन्दर परिभाषा।
    जीवन ही तो है अभिलाषा।

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  18. अनवरत बहते हुए भावों सा ..
    छूते हुए दोनों छोर ...
    कभी कोमल एहसास लिए ...
    भर अपनी अंजुरी ..
    कभी कठोर वायु के वेग से ..
    विपरीत दिशा में भी बहते हुए ...
    असहनीय वेदना ..सहते हुए ...!

    ak prishkrit chintan ....badhai Anupama ji.

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  19. बेहद गहन अभिव्यक्ति।

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  20. कैसे बहता है ये निर्मल शीतल जल ...
    सहनशीलता की पराकाष्ठा लिए हुए ..
    मिलकर इसमें...घुलकर इसमें...
    माटी भी मोक्ष पा जाती है...!!

    जीवन की नदी और दो किनारों के बिम्ब को लेकर बुनी एक सुंदर मनन योग्य कविता !

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  21. वाह क्या बात है बहुत खुबू और बहुत ही गहन अभिव्यक्ति... समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  22. इन्हीं दो किनारों के बीच ..
    प्रवाहमान ...स्वच्छ पारदर्शी
    नदिया का जल है जीवन ...
    अपना ही मन है जीवन ...!
    साक्षी भाव से सब कुछ को देखती एक अनुभूति सान्द्र रचना

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  23. सुन्दर प्रस्तुति.
    आभार.

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  24. आपके इस उत्‍कृष्‍ट लेखन के लिए आभार ।

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  25. सार्थक गहन अभिव्यक्ति...
    सादर आभार...

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  26. गहन अभिवयक्ति........ और सार्थक पोस्ट.....

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  27. मन, जीवन, नदी, मोक्ष....एक ही धारा के मध्य अहसास.

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  28. सार्थक अभिव्यक्ति |गणतंत्र दिवस की बधाई |

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  29. जीवन भी इसी नदिया की तरह कल कल बहता रहे तो आनंद आ जाये ...

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  30. इन्हीं दो किनारों के बीच ..
    प्रवाहमान ...स्वच्छ पारदर्शी
    नदिया का जल है जीवन ...
    अपना ही मन है जीवन ..


    वाह...क्या खूब बात कही है...इस रचना के लिए ढेरों बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  31. बहुत ही सुन्दर रचना! गहन भावों से भरी हुई!
    पहली बार आना हुआ, बहुत अच्छा लगा.
    धन्यवाद!

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