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05 February, 2012

रीत जीवन की .......

हँसते  हँसते जब आँख भर आई ...
धुंधली सी पड़ने लगी ...
बासंती अमराई ...!

धुंधलका सा छाने लगा ...
गया ही कहाँ है बसंत ...
क्या  पतझड़ आने लगा ..?
भयभीत ...
मन मौन फिर छाने  लगा ...!

किसलय अनुभूति क्षण की ....
प्रतिपल पुलक देती प्रतिक्षण की ..
ये भी क्या रीत जीवन की ...?
डोले पवन  गाए राग   हिंडोल ...
बसंत  का जैसे तराना  हुआ ...
द्रुत लय होती चली गयी ......
सांय सांय पवन बहती चली गयी ....... 
लो झड़ने जो लगे पीले पके से पात ..
इस  तरह   पतझड़ का...
क्यूँ आना हुआ ..?

 बस  कहने की बातें हैं .....
अडिग रह कर ..
काँटों भरी राह पर चल कर .. ...
जीवन  से  प्रीती  कहाँ  ..संजो पाते हैं .....?
हम कहाँ  मन को समझाते हैं ...सुलझाते हैं ...?
सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते  हैं ...?
बस  रीत प्रकृति  की ही  निभाते  हैं ।

बसंत में खिलते हैं ....
पतझड़ में ..फिर  बसंत के इंतज़ार में ...
अनकहे शब्द ..मौन रह  जाते हैं ......


रीत जीवन की ही निभाते रह जाते हैं ....!!
सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते हैं ...??


*हिंडोल -राग का नाम है जो बसंत ऋतू में गयी जाती है ...
*तराना -नोम तोम दिर ताना ...इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर बंदिश लेते हैं ...जिसे तराना कहते हैं ...!

27 comments:

  1. किसलय अनुभूति क्षण की ....
    ये भी क्या रीत जीवन की ...?
    डोल डोल पवन हिंडोल ...
    बसंत का तराना हुआ ...
    द्रुत लय होती चली गयी ......
    सांय सांय पवन बहती चली गयी .......
    लो झड़ने जो लगे पीले पके से पात ..
    इस तरह पतझड़ का फिर आना हुआ ...!!

    बहुत सुन्दर, अच्छे ढंग से शब्द समायोजित किये आपने !

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  2. रीत जीवन की ही निभाते रह जाते हैं ....!!
    सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते हैं ...??

    सच कितना कुछ विषम सा उलझा सा रह जाता है..... सुंदर रचना

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  3. सुंदर रचना।
    गहरे भाव।

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  4. किसलय अनुभूति क्षण की ....
    ये भी क्या रीत जीवन की ...?
    डोल डोल पवन हिंडोल ...
    बसंत का तराना हुआ ...
    द्रुत लय होती चली गयी ......
    सांय सांय पवन बहती चली गयी .......
    लो झड़ने जो लगे पीले पके से पात ..
    इस तरह पतझड़ का फिर आना हुआ ...!!...basant mein bhi ek saanye saanye sa bhaw

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  5. ऋतुओं का आवागमन तो रहेगा. लेकिन समभाव से जीवन जीना एक कड़ा अनुशासन है. बहुत सुंदर कविता और भावाभिव्यक्ति.

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  6. कल 06/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. subah ke intzaar mein raat,dopahar ke intzaar mein subah,shaam ke intzaar mein dopahar,raat ke intzaar mein shaam ,
    silsilaa khatm ho to kucchh likhoon ?
    +++++++ full marks

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  8. हम भी से अव्यक्त भावों की प्रतीक्षा में जीवन बिताने को तैयार बैठे रहते हैं..

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  9. बस इसी बिंदु पर हम दुर्बल होकर काल-चक्र के हाथो एक खिलौना बन जाते है ..और बस रीत ही निभाते निभाते धरती भी छोड़ जाते हैं.. सोचने को सब कुछ सोचते रहते हैं.. अंतरसत्य को उद्घाटित करती रचना अच्छी लगी..

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  10. बसंत में खिलते हैं ....
    पतझड़ में ..फिर अगली बसंत के इंतज़ार में ...
    अनकहे शब्द ..मौन रह जाते हैं ......
    सच कहा यही तो जीवन है………आना जाना यहाँ निरन्तर कोई ना परमानेन्ट

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  11. बसंत, हिंडोल, तराना...
    वाह,
    यही तो जीवन की रीत है।
    बहुत सुंदर कविता।

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  12. समभाव भाव से जीना आ जाए तब जीवन सार्थक बन जाएगा .....

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  13. आप सभी के विचार पढ़ कर अच्छा लग रहा है ....बात यहाँ भावनाओं की नहीं है ...भावनाएं तो मनुष्य के नियंत्रण में होती हैं ....जैसे बसंत के बाद पतझड़ आया तो परिस्थिति एकदम बदल गयी ...... उन परिस्थितियों की डोर मनुष्य के हाथ में नहीं हैं ...उन परिस्थितियों के अधीन मनुष्य विचलित हो अपनी कर्मठता खोता है और तभी नकारात्मकता आती ही है ... ...बहुत सम भाव से रहना ...मुश्किल होता है ...!!

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  14. सार्थक आलेख है ,अंत ही तो एक नै शुरुआत का संकेत होता है ,आनंद की अनुभूति

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  15. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने....

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  16. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 06-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  17. वाह!!!!!बहुत सुंदर प्रस्तुति ,इस अच्छी रचना के बहुत२ बधाई,स्वीकार करे

    NEW POST....
    ...काव्यान्जलि ...: बोतल का दूध...
    ...फुहार....: कितने हसीन है आप.....

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  18. समभाव से जीवन जीना इतना सरल नहीं उसके लिए कड़े अनुशासन की आवश्यकता होती है |
    बहुत गहन भावपूर्ण रचना |
    आशा

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  19. रीत जीवन की ही निभाते रह जाते हैं ....!!
    सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते हैं ...??

    jivan ki reet shaayad yahi hai...sam bhaav se jivan na jina. mumkin hi kaha hota sam bhaav ko jivan mein utarna, yahi niyati aur prakriti. shubhkaamnaaye.

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  20. बस रीत प्रकृति की ही निभाते हैं ...........bahut satya....sparsh kiya...

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  21. बसंत के बाद पतझड़ ....यही रीत है |

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  22. रीत जीवन की ही निभाते रह जाते हैं ....!!
    सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते हैं ...??
    बहुत सुन्दर भाव ..बेहतरीन प्रस्तुति..

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  23. बहुत सुन्दर भाव ,बेहतरीन प्रस्तुति..बधाई अनुपमा जी.

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  24. रीत जीवन की ही निभाते रह जाते हैं ....!!
    सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते हैं ...??
    jeevandarshan me hi reet hai ......reet virakti antim sanskar tk nahi ho pati Anupama ji....apki sundar rachana ke liye vishesh abhar.

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  25. रीत जीवन की ही निभाते रह जाते हैं ....!!
    सम भाव से जीवन कहाँ जी पाते हैं ...??..

    ये तो सचाई है जीवन की ... एक सा तो कभी नहीं रहता तो सम भाव से जीवन भी कैसे रहे ... बस रीत निभानी जरूरी होती है ...

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  26. behad sundar rachana ke liye ak bar punh badhai ....Anupama ji mere blog tk kabhi nhai pahuch pati hain .....amantran sweekaren.

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नमस्कार ...!!पढ़कर अपने विचार ज़रूर दें .....!!