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15 January, 2014

ममता


मन आलोकित  कर देता
प्रातः  खिले सूर्य  जैसा
 खिलता है उर सरोज
स्पर्श सुधियों का ऐसा

एक अडिग विश्वास
सतत संग चलता है 
नैनों मे इक सपन
सुनहरा सजता है 

साथ चले जो साथ निभाए 
नित नित हर पल 
अमृत रस  से  भरा 
घड़ा जो छलकता है


सोकर भी जागी
आँखों में बसती है 
सुध बुध नहीं खोती है
ममता जगती  है

प्रकृति सी प्राकृत
ये शीतल रात्रि  में भी
ओस के मोती
भर भर प्रभास  पिरोती है

व्याप्त  नीरवता  में
कैसा है राग छिपा
पा विस्तार स्वरों का
गीतों  सी बहती है 

16 comments:

  1. व्याप्त नीरवता में
    कैसा है राग छिपा
    पा विस्तार स्वरों का
    गीतों सी बहती है

    नीरवता का अपना ही राग है, जो समझ सके तो सुने उसे गुनगुनाते हुए... बहुत सुन्दर, बधाई.

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  2. जो इस राग के नाद को सुनता है वह सच उनका प्रिय पात्र होता है ।

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  3. हृदय से आभार शिवम भाई ...ब्लॉग बुलेटिन पर आपने मेरी कृति का चयन किया ....!!

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  4. सोकर भी जागी
    आँखों में बसती है
    सुध बुध नहीं खोती है
    ममता जगती है
    बहुत सुन्दर भाव ... अच्छी कविता ..

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  5. इतने निर्मल भाव के शब्दों का साथ तो राग ललित सा असर आने आप हो जाता है. अति सुन्दर.

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  6. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  7. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  8. प्रकृति स्वयं में मुक्त जीवन राग है।

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  9. सुध बुध नहीं खोती है
    ममता जगती है
    बहुत सुन्दर भाव ... अच्छी कविता .

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  10. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  11. अच्छी कविता.....

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  12. ममता प्रकृति की हर गतिविधि में परिलक्षित होती है...सुंदर अभिव्यक्ति...

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  13. एक अडिग विश्वास
    सतत संग चलता है
    नैनों मे इक सपन
    सुनहरा सजता है

    कोमल भावों से सजी कविता..

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