नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

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नमष्कार..!!!आपका स्वागत है ....!!!

16 December, 2013

कुछ शब्दों की लौ सी …




सृष्टि का एक भाग
अंधकारमय करता हुआ ,
 विधि के प्रवर्तन से बंधा
जब डूबता है सूरज
सागर के  अतल प्रशांत  में
सत्य का अस्तित्व बोध  लिए,
कुछ शब्दों की लौ सी,
वह  अटल आशा  संचारित  रही
मोह-पटल  के स्वर्णिम  एकांत  में .....!!

उस लौ के साथ
तब ....कुछ शब्द रचना
और रचते ही जाना
जिससे पहुँच सके तुम तक 
अंतस की वो पीड़ा   मेरी 
क्यूंकि शब्द शब्द व्यथा  गहराती है
टेर हृदय की क्षीण सी पड़ती 
पल पल बीतती ज़िंदगी 
मुट्ठी भर  रेत सी फिसलती जाती है ....!!


04 December, 2013

भेद अभेद ही रह जाये ...!!

विस्मृत नहीं होती छवि
पुनः प्रकाशवान रवि
एक स्मृति है
सुख की अनुभूति है ....!!
स्वप्न की पृष्ठभूमि में
प्रखर हुआ  जीवन ...!!
कनक प्रभात उदय हुई
कंचन   मन आरोचन .........!!

अतीत एक आशातीत  स्वप्न सा प्रतीत होता है

पीत कमल सा खिलता
निसर्ग की रग-रग  में रचा बसा
वो  शाश्वत प्रेम का सत्य
उत्स संजात(उत्पन्न) करता
अंतस भाव  सृजित  करता
प्रभाव तरंगित करता  है ..!!
.
तब शब्दों में  …
प्रकृति की प्रेम पातियाँ झर झर झरें
मन  ले उड़ान उड़े
जब स्वप्न कमल
प्रभास से पंखुड़ी-पंखुड़ी खिलें  ......!!

स्वप्न में खोयी सी
किस विध समझूँ
कौन समझाये
एक हिस्सा जीवन का
एक किस्सा मेरे मन का
स्वप्न जीवन है या
जीवन ही स्वप्न है
कौन बतलाए ....?
भेद अभेद ही रह  जाये ...!!

04 November, 2013

नित नया किनारा ...??


''हौसले अंतरनाद भी करते हैं .....अपनी चीख़ों की प्रतिध्वनि की शून्यता  मेँ अपनी पूरी ज़िंदगी का हिसाब किताब करते हैं .....''
रश्मी दी के विचार बहुत गहन सोच दे रहे थे .....उसी से आगे बढ़ते हुए मेरे मन के भाव ..............कुछ इस प्रकार ......आभार रश्मि(प्रभा) दी गहन चिंतन देने के लिए जिसने कविता का रूप लिया .....!!


वेग से उत्फुल्ल  ह्रदय  में
उछलती थीं प्रबल
मचलती ...उमड़ती ...घुमड़ती
जीवट   भावों सी तरंगें
जिस धुरी को छू जाती
.बस वहीं  तक  किनारा ......!!!
फिर धूमिल सागर मेँ...!!

सागर के अथाह
सुनील विस्तार में सिमटी
उसके   फेनिल   उज्ज्वल  स्पंदन  में
पाती जब विस्तार 
होती गति पूर्ण 
करती है उन्मत्त नर्तन 
भावना लेती  है हिलोर 
अंतर्नाद का बुलंद होता है हौसला 
इसी हौसले की प्रतिध्वनि से 
हुंकार करती हुई 
आकार लेती है 

उठती है....मिटने को
 प्रत्येक समुज्ज्वल उत्ताल लहर
क्यों बनाती है ...स्वनिर्मित
नित नया किनारा ...??


क्षणभंगुरता  जीवन की
जानती है सब
फिर भी ..मानती नहीं
जिजीविषा से भरी
ओज से  उल्लसित
समुज्ज्वला ... रुकती नहीं ....!!


प्रत्येक लहर का बनता ही है
अपना किनारा
फिर धूमिल ..सागर में ...!


फिर मिटने को उठती है
प्रत्येक समुज्ज्वल उत्ताल  लहर
पाती है सागर से ही विस्तार
 होता है सागर में ही विस्तार
जब देती है सागर को विस्तार
 बनाती जाती है ...स्वनिर्मित
नित नया किनारा ...!!
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''उदास आँखों से साहिल को देखने वाले .....
हर इक मौज की आगोश में किनारा है ....''



इसी बात पर आज ये गीत भी सुनिए ........






'गर्भनाल' पत्रिका के नवम्बर २०१३ अंक में प्रकाशित हुई है और
इसी कविता का प्रसारण आकाशवाणी दिल्ली से भी आ चुका है। 

25 October, 2013

स्वप्न न बुनूँ ....तो क्या करूँ ....??


ताना बाना है जीवन का
भुवन की कलाकृति
आँखें टकटकी लगाए ताक रही हैं
अनंत स्मिति.....!!

घड़ी की टिक टिक चलती
समय जैसे  चलता चलता भी ...रुका हुआ

शिशिर की अलसाई हुई सी प्रात
झीनी झीनी सी धूप खिलती शनैः शनैः
शीतल अनिल  संग संदेसवाहक आए हैं
सँदेसा लाये हैं
उदीप्त हुई आकांक्षाएँ हैं
......ले आए हैं मधुमालती की सुरभि से भरे
कुछ कोमल शब्द मुझ तक
...अनिंद्य आनंद दिगंतर
तरंगित भाव शिराएँ हैं  ....!!

गुनगुनी सी धूप और ये कोमल शब्द-
सुरभित अंतर
कल्पना दिगंतर
भाव  झरते निरंतर
स्वप्न न बुनूँ ....तो क्या करूँ ....??




19 October, 2013

क्या कहता है मन .....

बांधता है वक़्त  सीमा में मुझे ......
भावों की उड़ान तो असीम  है ....
अनंत  है .....
तो फिर ...  क्या है जीवन  ....??
चलती हुई सांस .....
अनुभूत होते भाव  ....
बहती सी नदी ...
सागर सा विस्तार ....
आज शरद पूनम की रात
 झरता हुआ चन्द्र का हृदयामृत ...
या रुका सा मन ....
जो मुसकुराता हुआ ....
खोज लाता है गुलाबी सुबह का एक टुकड़ा .....
अपनी किस्मत सहेज ...
मुट्ठी में भर कर ....!!

भरी दोपहर  भी  ढूंढ लेता है मन  ....
पीपल की छांव ....
वो अडिग अटल विराट वृक्ष के तले ....!!
घड़ी भर बैठ ....
मिल जाता है .........
ज़िंदगी के गरम से एहसासों को आराम ....
फिर कुछ गुनगुनाती हुई .....शाम की ठंडी बयार । ....

और फिर पहुँच जाता है मन .....
अम्मा (दादी)के चूल्हे के पास ...
हाथ से सेंकती हैं अम्मा ....
एक एक फूली फूली रोटी ....
चूल्हे पर ...
 बुकनू ...शुद्ध घी और गुड़ ....!!

और माँ भी तो आस पास ही हैं ....
चौका समेटतीं ....!!!!!!
जब माँ की आवाज़ कानो मे गूँजती है .....
परों से भी हल्का मन ....
कब नींद से  घिर जाता है ...
पता ही नहीं चलता ....!!
सुबह उठती हूँ फिर .....
जब  गुनगुनाता है जीवन ....!!!!!!
यही तो ज़िद है मेरी .....
जब तक जीवन गुनगुनाता  नहीं ....
मैं सोती ही रहती हूँ ....!!
देखो तो .....गुनगुनाने लगी है ....
गुलाबी शिशिर   सी प्रात की धूप अब ......!!



15 October, 2013

हाइकु ...संवेदना ....

ज्यों टूटकर ...
गिरती पीली पात  .....
बीतते लम्हें ...


 रैन  न बीते ....
ये  क्षण रहे रीते ....
आस न जाए ...

कुछ तो कहो ....
ऐसे चुप न रहो ....
नदी से बहो .....



संवाद से ही ....
मुखरित  होती है ...
संवेदनाएं ....


ठिठक गई ....
मूक सी हुई जब ...
संवेदनाएं ....



संवेदना ही ..
ज्योति है जलाये ...
जीवन खिले ....

मानवता ही ...
परम दया धर्म .....
एक मुस्कान ...


तरंग जैसी .....
छू जाती हैं  मन को .....
संवेदनाएं ....


सृजन खिला ... ..
संवेदनशील हो .....
तरंग बना ...





05 October, 2013

माँ मुझे आने तो दो ....

आद्या  शक्ति माँ सुखदायिनी ...!!
हे माँ मुझे आने दो ....
अपने  संसार में ...
नव राग प्रबल गाने दो ....

शक्ति दायिनी...
 माँ तुम  हो मेरी ...
आस मेरी ...मुझमें  उल्लास भरो ....!!

भाई जैसा ...
मेरी शिराओं में भी ....
चेतना का  संचार करो .....
माँ मुझसे भी तो प्यार करो ....!!

छल छल कर दुनिया छलती है ....
तुम तो न जग का हिस्सा बनो .....
मुझे जीवन दो पालो-पोसो ....
नव-शक्ति का किस्सा बनो ...


जब तुम जग से भिड़ पाओगी .....
अपनी छाया फिर देखो तुम ...
जग से मैं भी लड़ जाऊँगी ...
पोसूंगी तब अपने सपने .....
और एक उड़ान पा जाऊँगी ....!!

माँ मुझे आने तो दो ....
अपने संसार में ....
नव राग प्रबल गाने तो दो ...!!
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