मुड़ती हुई सी राह की वो मुश्किलें
कर न पाईं थीं मेरे मन को हताश
गूँज उठती आस वही एक नाद बन
रंग उठता था कि जैसे बन पलाश !!
प्रकृति से सार पाने की क्रिया का
भोर से मन जोड़ने की प्रक्रिया का
नित नए अवगुंठनो को खोलने का
करती हूँ सतत अनूठा सा प्रयास !!
मुड़ती हुई सी राह की वो मुश्किलें
कर न पाईं थीं मेरे मन को हताश
मोर की टिहुँकार सुन मैं जाग जाती
पपीहे की पिहु पिहु में गीत गाती
बासन्ती हँसी में जाग जाती मेरे हृद की
सोई हुई अप्रतिम उजास !!
मुड़ती हुई सी राह की वो मुश्किलें
कर न पाईं थीं मेरे मन को हताश !!
अनुपमा त्रिपाठी
'सुकृति '





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