इंसान की इंसानियत के साथ
जीता ...जागता ..लहलहाता ...
खड़ा हूँ यहाँ ...इसी जगह ...
जीता ...जागता ..लहलहाता ...
खड़ा हूँ यहाँ ...इसी जगह ...
सदियों से ...!!
देखे हैं धरा पर ...
मौसम के कई रूप ..
देखे हैं धरा पर ...
मौसम के कई रूप ..
आज फिर देख रहा हूँ ...
वही मौसम का बदला हुआ स्वरूप ..
ए हवा .. सायं सायं चलती है ..
इठलाती ..करती अटखेली है .....
प्रेम से छूकर मुझे यूँ यक-बयक
दूर चली जाती है ...
अब शूल से चुभाती है ....!!
दूर चली जाती है ...
अब शूल से चुभाती है ....!!
चलती है तो चल ...पुरज़ोर चल
यूँ मुझे न डरा ...
आंधी से ....तूफान से ...
लड़ता चला हूँ ......
अडिग खड़ा हूँ ....
आंधी से ....तूफान से ...
लड़ता चला हूँ ......
अडिग खड़ा हूँ ....
मैं बरगद का पेड़ हूँ ..
कोई हरी ..पीली पात नहीं ..
जो संग तेरे उड़ जाऊँगा ...
पतझड़ से भला ..
मैं क्यों डर जाऊँगा ....?
मैं क्यों डर जाऊँगा ....?
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