नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!
नमष्कार..!!!आपका स्वागत है ....!!!

21 June, 2013

तुम बिन .......कुछ हाइकु ....

चारों ओर तबाही का मंज़र .......बहुत उदास कर रहा है मन .....जाने कितने ही  परिवारों पर बिपदा पडी है ....ईश्वर सबकी रक्षा करें ....

तुम बिन हैं ....
सूनी सूनी सी राहें ...
भीगी निगाहें ...


 मनः पटल ....
हैं स्मृति की  रेखाएं ...
मिट न पाएं....

पलकों मेँ है  ......
मोती से अनमोल ...
 छुपे रतन ....

गूंजे सदा ही ...
कानो में अनमोल ...
तुम्हारे बोल ...

ढलक जाएँ ...
आंसू रुक न पायें ...
...छलके पीर ...

झरना बहे ... ...
मन बहाए नीर ...
न धरे धीर ....

असह्य पीर ...
निर्झर बहे नीर ...
व्यथा पिघले ...

सजल नेत्र ....
भरी जीवन पीर ....
डबडबाएं........

झरना झरे ....
ज्यों मन व्यथा झरे ...
झर झर सी ...


बंद पलक .....
गहराती है पीड़ा ...
उदास मन ...

मन सागर ....
वेदना असीम है ..
सूखे नयन ...


सूरज डूबे ...
ढेरों  रश्मियाँ लिए ....
डूबती आशा...


बर्फ सी ठंडी ....
संवेदनाएं हुईं ....
शिथिल  मन .....


अथाह पीड़ा ....
बस मौन ही रहूँ ....
किससे  कहूँ ....?



सुनो न तुम .....
मेरी मन बतियाँ ...
नैना बरसें ....


तुम्हारे बिन .....
सूने ये रैन दिन ...
नेहा बरसे ..............

मन सिसके .....
जो तुम चले आओ ...
मन बहले ...

15 June, 2013

.बरसन लागी बरखा बहार ....!!

बुंदियन बुंदियन ...सुधि .
अमिय  रस बरसन लागा ...

पड़त फुहार ...
नीकी चलत बयार ...

पंछी मन डोले ...
संग डार डार बोले ....

आज सनेहु  आयहु मोरे द्वार ....
री सखी ...
बरसन लागी बरखा बहार ....!!!



कोयल कूक कूक  हुलसानी ....
पतियन पतियन हरियाली इठलानी...

गरजत बरसत घन ढोल घन न न बाजे ...
थिरकत  मन  सोलह सिंगार साजे ...

 बरसे बदरा सुभग नीर ...
मिटी मोरे मनवा की   पीर ...

आज सनेहु  आयहु मोरे द्वार ...
री सखी ....बरसन लागी बरखा बहार ....!!




11 June, 2013

कौन है ये ...????


तमस प्रमथी ....
अदम्य शक्ति ...

अशेष भक्ति ...
रूप सरूप अरूप दिखाती ...
दुर्गा रूपिणी ...
दुर्गति दूर करती ....
दुआओं की  धनी ...
माटी  की बनी ...
दूर सुदूर तक फैला है ...
इसकी दुआओं का साम्राज्य ...
न कोई आदि न कोई अंत ..
सन्तति की रक्षा हेतु ...
सदा करती है साधना ...
मांगती है सुरक्षा कवच ...

जहाँ चाहो वहां दृष्टिगोचर है ...
प्रभास ...
प्रात  की प्रभा में ...
पाखी की उड़ान में ...
सुरों  के स्पंदन में ...
शीतल वायु के आलिंगन में ...
जल के प्रांजल प्रवाह  में ....
सूखी दग्ध ..उड़ती हुई धूल के कण में ...
या ...भीगी सी ....
सोंधी माटी की महक में .... ...
सुकून देता ...एक एहसास ...माँ के स्पर्श सा ...!!


आँख खोलो तुम्हारे समक्ष ....
बंद नयन तुम्हारे भीतर ...
सुचारू  परिदर्शन ...
एक शक्ति दिव्य सी ...
माँ जैसी ...

कौन है ये ...????
सुदृष्टि ...?

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सुदृष्टि साथ हो .....हर पल खिला खिला  ....मुस्काता सा ....वर्ना जीवन और मृत्यु में कोई भेद नहीं .......

26 May, 2013

तुम्हारा गुलमोहर ....

देखो तो कैसा दहक रहा है ...
  गुलमोहर ....सुर्ख लाल ....!!

बिलकुल  तपते  हुए उस सूर्य  की तरह ...

मेरे प्यार से ही  ...
लिया  है उसने ये रंग ...!!

और ....

उससे ही  लिया है मैंने ...
जीवन जीने का ये  ढंग ...!!

सूर्य की तपिश हो ...
या हो ...
जीवन की असह्य पीड़ा ...
क्या रत्ती मात्र भी कम कर पाई है ...
मेरे प्रेम को ........????

प्रभु तुम साथ हो तो
इस ज्वाला में भी जल जल कर ...
स्वर्णिम सी  होती गई मैं ....!!

दहक रहा है  भीतर मेरे ...
हे ईश्वर ...तुम्हारा ही गुलमोहर ....

21 May, 2013

तू ही अंजानी ...!!


जब ...

भरी दुपहरी ...
दमके सूरज ...
जलता जल ...
जले जिया ...!!
आकुल मन  ...
सूना सा नभ ...
शुष्क हिया ...!!

तब  ...

जीवन ठगिनी ...
माया  जानी .....



कौन दिशा से ..
आई है री ...
पवन दिवानी ....!!
रही  हरि से अंजानी ...!!

मुठ्ठी मे भर लाती ...
थोड़ी ठंडक ...
थोड़ा सा पानी ...!!

अब
समझे कौन  है...........
आस मेरी वो  प्यास मेरी ...
पीर  मेरी ...हृद चीर मेरी ...
व्यथा मेरी ,अकथ कथा मेरी ...

जब
तू ही  अंजानी ...!!

17 May, 2013

चम्पक बन में बैठ सखी संग ... ....

चम्पक बन में बैठ सखी संग ...
वृहग वृन्द  का  कलरव सुनना ....
ढलते दिवस के अवरोह पर ..
राग दरबारी के ....
खरज से ...
कुछ गंभीर प्रकृति के  स्वर लेना ......


फिर तजकर ....कुछ हंसकर ..
संध्या के  आरोह  गुनना .....

ई मन राग की पकड़ से ...
कुछ भावों का आलाप लेना ...
कुछ गाना ...गुनगुनाना ...मन बहलाना ....

कुछ मन की ...कुछ जीवन की ...
कुछ सपनों की बातों की ...
लहराती सी कवरी गूंथना ...
उराव से ....
चुन चुन चंपा के फूलों को ...
  भावों  की उस कवरी को ...
फिर सजाना ...संवारना ......और सजना ...

प्रियतम की अनुरागी बातों को ..
शर्म से कुछ कहना ...सुनना ...और हँसना ...
याद है ....?

और फिर इस तरह ...
वीतरागी से मन को ...
पुनः अनुराग में डुबो ........भिगो ....रंगो ......
 निशीथ  मन ......खिल खिल ....घर चले आना ...
याद है ....?

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*दरबारी-शास्त्रीय संगीत की राग का नाम है |इसकी प्रकृति गंभीर है |
*खरज -(lower octave )यानि मन्द्र  सप्तक के स्वर |
*ई मन -यमन राग को मुग़ल काल में ईमन भी कहा जाता था ...
*कवरी-बालो को गूंथ कर बनाई चोटी ....
*उराव-उमंग
*निशीथ -खुशियाँ


05 May, 2013

सृजन .....हाइकु ...

आस का पंछी ......
उड़े निर्बाध जब ...
खिले सृजन  ....

कैसे रचाऊँ ..
नित नया सृजन ...
ये शब्द पूछें ...!!

उड़े बयार .....
शब्द उड़ा ले जाए  ....
भरें उड़ान ...

पंख पसार ...
उड़  जा उस पार ....
संदेसा ले जा ....

उड़ती जाऊं ...
मैं ढूंढ ढूंढ लाऊँ ...
शुभ   सृजन.....

जागा सवेरा ....
अब उड़ते  पंछी ...
नील वितान ....