''ज़िंदगी एक अर्थहीन यात्रा नहीं है ,बल्कि वो अपनी अस्मिता और अस्तित्व को निरंतर महसूस करते रहने का संकल्प है !एक अपराजेय जिजीविषा है !!''
नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!
नमष्कार..!!!आपका स्वागत है ....!!!
10 October, 2014
03 October, 2014
प्रगाढ़ हरित अवलंब की छत्र छाया में......
इस विराट वटवृक्ष के ....प्रगाढ़ हरित अवलंब की छत्र छाया में
सत्व पूर्ण एक नीरवता है,
अविच्छिन्न .....!!
हथेलियों पर आक्रोश
ग्रहण करती हुई,
ग्रहण करती हुई,
सायास प्रकाश बचाने के प्रयास में
अकंपित अविचलित रहती हूँ मैं
प्रलयकारी इस वेग में भी .......!!
और इस तरह बचा ले जाती हूँ
तूफान के बीच भी
अंजुरी में सँजोयी
वो दिये की लौ
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सभी का जीवन उज्ज्वल प्रकाशमय हो ....विजयदशमी की अनेक शुभकामनायें !!
अंजुरी में सँजोयी
वो दिये की लौ
जो अंततः
उज्ज्वल कर देती है
हमारा जीवन .......!!
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सभी का जीवन उज्ज्वल प्रकाशमय हो ....विजयदशमी की अनेक शुभकामनायें !!
19 September, 2014
06 September, 2014
तुम्हारे मेरे बीच की कड़ी
तुम्हारे मेरे बीच की कड़ीसिर्फ एहसास ही नहीं है,
सिर्फ शब्द ही नहीं है,
सिर्फ प्रेम ,ईर्ष्या ,द्वेष या
सिर्फ आक्रोश भी नहीं है
बल्कि संकुलता से परे ,
तुम्हारा वो सशक्त मौन है ,
मेरे चारों तरफ ,
जो तुम्हारे होने का प्रमाण देता है
अपनी ऊर्जस्वितता में,
और बांधे रखता है सदा ,
दुख सुख में ,
हमे इस अटूट बंधन में...!!
28 August, 2014
प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!
दादुर ,मोर ,पपीहा गायें,...रुस रुस राग मल्हार सुनायें ,
बूंदों की लड़ियों में रिमझिम ,
गीत खुशी के झूमें आयें
टप टप गिरती,झर झर झरतीं
रिमक झिमक पृथ्वी पर पड़तीं
आयीं मन बहलाने लड़ियाँ
जोड़ें जीवन की फिर कड़ियाँ...!!
चलो बाग हिंडोला झूलें
दिन भर के दुख फिर से भूलें...!!
ऊंची ऊंची लेकर पींगें,
मन मोरा रसधार में भींगे...!!
छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
आहा , प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!
गीत खुशी के झूमें आयें
टप टप गिरती,झर झर झरतीं
रिमक झिमक पृथ्वी पर पड़तीं
आयीं मन बहलाने लड़ियाँ
जोड़ें जीवन की फिर कड़ियाँ...!!
चलो बाग हिंडोला झूलें
दिन भर के दुख फिर से भूलें...!!
ऊंची ऊंची लेकर पींगें,मन मोरा रसधार में भींगे...!!
छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
आहा , प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!
26 August, 2014
हर साल इसी तरह ....!!
बूंद बरसती ,
भर आह्लाद ,
अमोघ प्रेम मीमांसा बरसाती ,धरा पर बूंद बूंद
शब्दातीत भावातीत
श्रवणातीत,
(कहने सुनने से परे)
और लहलहा उठता है प्रेम,
सृष्टि की हरीतिमा में
हरित मन की हर्षित प्रतिमा में
मेरे अंगना में
मेरी बगिया मे ,
मेरी हरी चूड़ियों में,
कुछ तुम्हारे शब्दों में,
बज उठी हो जैसे बूंदों की ताल,
धिनक धिन
किंकिणी झंकार
जीवंत है प्रेम
पावन सा ...
पावस ऋतु की वर्षा में भीगा ,
हर वर्ष इसी तरह ....!!
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बारिश का रास्ता देखते देखते अब ब्लॉग पर ही बारिश डाली है .........शायद ईश्वर दिल्ली में कुछ बरसात भेज दें .....!!
22 August, 2014
तपन .....हाइकु ...
तुमरी ठौर....ढूँढे वही ठिकाना ...
मनवा मेरा ....
तपन बढ़े ...
कैसे दुखवा सहूँ ...
जियरा जले ...
जलता जल .. .
तपन अविरल ....
करे श्यामल ....
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उड़ता जल ...
तपिश सूरज की ..
आकुल मन ...
जल जलता ....
जलती भावनाएं ...
सूखती नदी ..
चाहे मनवा .....
आस घनेरी जैसी ...
शीतल छाँव ...
मन बांवरा ....
तपन जले जिया ....
मन सांवरा ...नीरस मन ...
जलती भावनाएं ....
दग्ध हृदय ...
देखो तो कैसी ...
तपती दुपहरी ....
सूनी हैं राहें ...........
ए री पवन ...
भर लाई तपन ...
जियरा जले ....
व्याकुल मन ...
मैं क्या करूँ जतन...
नीर न पाऊं .....!!
धू धू करती ...
तपती दोपहर ..
चलती हवा ...
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