नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!

नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!
नमष्कार..!!!आपका स्वागत है ....!!!

15 June, 2021

नव गीत


पृथक राह के अथक प्रयास ,
बाँध गए जीवन की डोर,
शुभ आशीष बरसता जैसे 
नाच रहा है मन का मोर 

कण कण पर रिमझिम सी बूँदें 
लाइ हैं संदेस अनमोल 
प्रकट हुआ आह्लाद ह्रदय का ,
ऐसे आई नवल विभोर 

बूंदों की रिमझिम में साजन 
सजनी का श्रृंगार वही 
प्रकृति ओढ़े हरियाली 
है सावन का राग वही 

आओ मिलकर अब हम कोई 
गीत रचें नया नया 
छायी हरियाली है जैसे 
प्रीत का रंग नया नया 

बूंदों के अर्चन में गाती 
राग कोई वसुंधरा 
नाद सुनहरी ऐसे गूँजे 
रोम रोम है पुलक भरा 

भीगी धरती अब हुलसाती 
बूँदों में रुनझुन गुण गाती 
किसलय के फिर नवल सृजन में 
सभी के मन को खूब लुभाती 

अनुपमा त्रिपाठी
    'सुकृति'

10 June, 2021

सुखनिता कविता हो ...!!

शीर्ष पर गोल कुमकुमी आह्लाद
प्रातः के नाद की
अलागिनी ,
ऊर्जा में निमृत
सुहासिनी ,
सत्व का अपरिमेय तत्त्व,
खिलता ही जाता
जैसे कोई अस्तित्व ,
तुम इस तरह
मुझ तक आती हुई
मेरी ही एक
सुखनिता कविता हो ...!!

अनुपमा त्रिपाठी
 "सुकृति "



06 June, 2021

निशाँ...!!




हवाओं में उड़ते हुए ,
तरन्नुम में तबस्सुम से 
महकते हुए
मुहब्बत के निशाँ
सुनो ......
कुछ तुम कहो कुछ मैं सुनूं ...!


रेत  पर चलते हुए , बहकते हुए 
जीवन सा चहकते हुए , 
बनते हुए क़दमों के  निशाँ ,
सुनो ... 
कुछ तुम चलो कुछ मैं चलूँ...!

जीवन को जीते हुए 
हँसते हुए रोते हुए 
हैं वक़्त के अनमोल  निशाँ 
सुनो ...
कुछ तुम लिखो कुछ मैं लिखूं !


अनुपमा त्रिपाठी
 "सुकृति "



01 June, 2021

पुलकिता !!

 



अजेय भास्कर की किरणों से ,

अनंत समय की वीथिका में ,

सहिष्णु  धारा  सा बहता जीवन ,


भोर से उदीप्त है स्नेह से प्रदीप्त है ,

रात्रि  की नीरवता में गुनता है  स्निग्धता


चन्द्र  से झरती प्रगल्भ ज्योत्स्ना  की

 विमल विभा पाता ,विभुता सा लहलहाता !


व्योम से मुझ तक ऐश्वर्य से पुलकित,

स्निग्ध  रात की कहानी कहता 

मेरा मन ,हाँ    …

ऐसे ही तो  तुम्हें मुझसे जोड़ता है ,

नयनो से  हृदय तक ,

तुम्हारी  स्निग्ध  शीतलता पाती मैं,


पुलक से आकण्ठ जब भर उठती हूँ ,

तब कहलाती हूँ तुम्हारी पुलकिता !!


अनुपमा त्रिपाठी 

    " सुकृति  "


28 May, 2021

जाग री...

 


जाग री...

बीती विभावरी 

खिल गए सप्त रंग 


उड़ते बन पखेरू

मन पखेरू 

विभास के संग 

शब्द प्रचय से संचित

मुतियन बुँदियन भीग रहा मन 

प्राची का प्रचेतित रंग 

बरसे घन 

घनन घनन 

बन जलतरंग 

जीवन उमंग 

छाया अद्भुत आनंद  !!


अनुपमा त्रिपाठी 

  'सुकृति '

25 May, 2021

वलय






उठती हुई पीड़ा हो ,
या हो 
गिरता हुआ ,
मुझ पर अनवरत बरसता हुआ 
सुकूँ ,
वर्तुल वलय के भीतर,
बनते अनेक वलयों की
जब जब 
यथा कथा कहती है
ये लहर , 
भाव मेरा इस तरह डूबता है 
कि फिर उभर आती है ,
कोई 
नई नवेली सी कविता !!

अनुपमा त्रिपाठी 
"सुकृति "

19 May, 2021

बारिश .....!!





बारिश .....!!

आच्छादित है बादलों से आकाश
कोइ व्यथा तो नहीं ,
बूँदों में कहता अपनी बात
कोइ कथा तो नहीं ...!

बोलो तो
चलते हुए समय को टोकोगे कैसे ?
बरसती हुई बूँदों को रोकोगे कैसे ?
कहीं भी कभी भी अलग अलग
हिस्सों में जो मिलती है
हँस हँस कर ,
झुक झुक कर
कभी रूठ कर
कभी मनाती
हुई ,
जिंदगी मेरी ही तो है
बिखरे हुए इन यादों के लम्हों को
जोड़ोगे कैसे ?

सरल हो भाषा तो  भी
अर्थ गहन होते हैं
अर्थ के भावों को माटी के मोल
तौलोगे कैसे ?

सुबह से शाम होती हुई जिंदगी को
लिख भी डालो लेकिन
जब तलक सूर्योदय न हो ह्रदय का 
रात की सियाही को
उजाले से जोड़ोगे कैसे  .....?

अनुपमा त्रिपाठी
   सुकृति