''ज़िंदगी एक अर्थहीन यात्रा नहीं है ,बल्कि वो अपनी अस्मिता और अस्तित्व को निरंतर महसूस करते रहने का संकल्प है !एक अपराजेय जिजीविषा है !!''
नमष्कार !!आपका स्वागत है ....!!!
नमष्कार..!!!आपका स्वागत है ....!!!
15 June, 2021
नव गीत
10 June, 2021
06 June, 2021
निशाँ...!!
मुहब्बत के निशाँ
सुनो ......
कुछ तुम कहो कुछ मैं सुनूं ...!
अनुपमा त्रिपाठी
01 June, 2021
पुलकिता !!
अजेय भास्कर की किरणों से ,
अनंत समय की वीथिका में ,
सहिष्णु धारा सा बहता जीवन ,
भोर से उदीप्त है स्नेह से प्रदीप्त है ,
रात्रि की नीरवता में गुनता है स्निग्धता
चन्द्र से झरती प्रगल्भ ज्योत्स्ना की
विमल विभा पाता ,विभुता सा लहलहाता !
व्योम से मुझ तक ऐश्वर्य से पुलकित,
स्निग्ध रात की कहानी कहता
मेरा मन ,हाँ …
ऐसे ही तो तुम्हें मुझसे जोड़ता है ,
नयनो से हृदय तक ,
तुम्हारी स्निग्ध शीतलता पाती मैं,
पुलक से आकण्ठ जब भर उठती हूँ ,
तब कहलाती हूँ तुम्हारी पुलकिता !!
" सुकृति "
28 May, 2021
जाग री...
जाग री...
बीती विभावरी
खिल गए सप्त रंग
उड़ते बन पखेरू
मन पखेरू
विभास के संग
शब्द प्रचय से संचित
मुतियन बुँदियन भीग रहा मन
प्राची का प्रचेतित रंग
बरसे घन
घनन घनन
बन जलतरंग
जीवन उमंग
छाया अद्भुत आनंद !!
अनुपमा त्रिपाठी
'सुकृति '
25 May, 2021
वलय
उठती हुई पीड़ा हो ,
या हो
बनते अनेक वलयों की
जब जब
ये लहर ,
कि फिर उभर आती है ,
19 May, 2021
बारिश .....!!
बारिश .....!!
आच्छादित है बादलों से आकाश
कोइ व्यथा तो नहीं ,
बूँदों में कहता अपनी बात
कोइ कथा तो नहीं ...!
बोलो तो
चलते हुए समय को टोकोगे कैसे ?
बरसती हुई बूँदों को रोकोगे कैसे ?
कहीं भी कभी भी अलग अलग
हिस्सों में जो मिलती है
हँस हँस कर ,
झुक झुक कर
कभी रूठ कर
कभी मनाती
हुई ,
जिंदगी मेरी ही तो है
बिखरे हुए इन यादों के लम्हों को
जोड़ोगे कैसे ?
सरल हो भाषा तो भी
अर्थ गहन होते हैं
अर्थ के भावों को माटी के मोल
तौलोगे कैसे ?
सुबह से शाम होती हुई जिंदगी को
लिख भी डालो लेकिन
रात की सियाही को
उजाले से जोड़ोगे कैसे .....?
अनुपमा त्रिपाठी
सुकृति







