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20 May, 2022

अनहद

दूर से आती हुई आवाज़ भला कैसे सुनूं
मुझे अनहद पे यकीं आज भी बेइंतहा होता है
याद आता है स्पर्श माँ का जब भी
दिल के कोने में फिर इक ख़ाब सा महकता है
रुक रुक के चलते हुए कदमों की तस्लीम थकन
इस भटकन के सिवा  ज़िन्दगी में रक्खा भी क्या है ?
मुझको चाहो या भूलो पर ऐतबार तो करो
अपनी दानिश का वजूद हर सिम्त यूँ कहता क्या है !!


तस्लीम -स्वीकार करना
दानिश -शिक्षा
सिम्त -ओर ,तरफ।
अनुपमा त्रिपाठी 
   सुकृति

12 comments:

  1. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 22 मई 2022 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 22 मई 2022 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका यशोदा जी !!

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  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (22-5-22) को "यह जिंदगी का तिलिस्म है"(चर्चा अंक-4438) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

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    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका कामिनी जी !!

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  4. मुझको चाहो या भूलो पर ऐतबार तो करो
    –बहुत खूब

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  5. बेइंतहा यकीन ही तो अनहद है। अनूठा भाव।

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  6. कोमल भावों से पूर्ण सुंदर सृजन

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  7. याद आता है स्पर्श माँ का जब भी
    दिल के कोने में फिर इक ख़ाब सा महकता है
    .. माँ जिन्दा धड़कनों का नाम है
    बहुत सुन्दर भाव

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  8. वाह !!! बहुत सुंदर । आज कल उर्दू पर ज़ोर आज़माइश है ।
    माँ का स्पर्श से ख्वाब का महकना .... लाजवाब 👌👌👌👌

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  9. बहुत ही सुंदर भावपूर्ण सृजन

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  10. बड़ी सुन्दरता से बांधा है भावों को कविता में!

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